हिंदी विंडो

हिंदी में दुनिया, दुनिया में हिंदी…!

Advertisement

ट्रंप-शी वार्ता के पीछे दिखा ‘इंडिया फैक्टर’, नई दिल्ली से वॉशिंगटन तक शी जिनपिंग की यात्रा ने बदले कूटनीतिक समीकरण ?

ट्रंप-शी वार्ता के पीछे दिखा ‘इंडिया फैक्टर’

ट्रंप-शी वार्ता के पीछे दिखा ‘इंडिया फैक्टर’ :शी जिनपिंग पहले भारत, फिर अमेरिका क्यों पहुंचे ? ट्रंप से मुलाकात के बीच ‘इंडिया फैक्टर’ क्यों बना चर्चा का विषय

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सितंबर 2026 की कूटनीतिक यात्रा ने भारत, अमेरिका और चीन के बीच बदलते रणनीतिक समीकरणों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। शी जिनपिंग 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 12 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे थे और इसके करीब दो सप्ताह बाद वह अमेरिका पहुंचे, जहां 24 सितंबर को उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बैठक निर्धारित थी। इस क्रम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक दिलचस्प सवाल खड़ा किया—क्या ट्रंप-शी बातचीत में भारत प्रत्यक्ष एजेंडे पर न होते हुए भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है ?

शी का भारत दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण था। यह 2020 के गलवान संघर्ष के बाद उनका पहला भारत दौरा था। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच 12 सितंबर को द्विपक्षीय बातचीत हुई। दोनों देशों ने पिछले कुछ समय में तनाव कम करने और संबंधों को स्थिर करने के लिए राजनयिक संपर्क बढ़ाए हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत और चीन के बीच सभी रणनीतिक मतभेद समाप्त हो गए हैं। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे अभी भी दोनों देशों के संबंधों में महत्वपूर्ण हैं।

नई दिल्ली में मोदी-शी बैठक के बाद चीन की ओर से भारत के साथ संबंधों को व्यापक वैश्विक संदर्भ में देखने का संकेत दिया गया, जबकि भारतीय पक्ष ने सीमा पर शांति, मतभेदों के प्रबंधन और द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर रखने पर अधिक जोर दिया। दोनों पक्षों के आधिकारिक बयानों के फोकस में अंतर भी विश्लेषकों के लिए महत्वपूर्ण रहा। India Today की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी पक्ष के बयान में भारत की विदेश नीति से जुड़े व्यापक मुद्दों और BRICS, Global South जैसे मंचों की भूमिका को ज्यादा जगह मिली, जबकि भारतीय पक्ष का जोर द्विपक्षीय संबंधों और सीमा से जुड़े मुद्दों पर रहा।

अब इसके बाद शी जिनपिंग की वॉशिंगटन यात्रा को देखा जाए तो तस्वीर और बड़ी हो जाती है। ट्रंप और शी की बातचीत में व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ताइवान और ईरान युद्ध जैसे मुद्दे प्रमुख रहने वाले थे। 24 सितंबर की बैठक से पहले अमेरिका और चीन ने अपने व्यापारिक संघर्ष को अस्थायी रूप से संभालने के लिए मौजूदा व्यापार युद्धविराम को दो महीने बढ़ाने पर सहमति बनाई थी। यह समझौता 10 नवंबर को समाप्त होना था और इसे 10 जनवरी 2027 तक बढ़ाया गया।

व्यापार के अलावा तकनीक भी वार्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। खासकर उन्नत चिप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी प्रतिस्पर्धा अमेरिका-चीन संबंधों के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में हैं। वहीं ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक तनाव का प्रमुख स्रोत बना हुआ है। India Today के अनुसार, शी की तरफ से ताइवान को लेकर अमेरिकी हथियार बिक्री पर सवाल उठाए जाने की संभावना थी, जबकि चीन पर ईरान के संदर्भ में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने के लिए अमेरिकी दबाव भी वार्ता की पृष्ठभूमि में था।

ईरान का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका-ईरान संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित किया है। चीन के ईरान के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं और वॉशिंगटन चाहता है कि बीजिंग अपने प्रभाव का इस्तेमाल तनाव कम करने में करे। दूसरी ओर, चीन ने अमेरिकी शर्तों के अनुरूप ईरान पर दबाव बनाने को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से सीमित रखी है।

इसी व्यापक परिदृश्य में भारत का महत्व सामने आता है। भारत एक तरफ अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक और रक्षा साझेदारी को आगे बढ़ा रहा है, वहीं चीन और रूस के साथ भी उसके महत्वपूर्ण आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा संबंध हैं। सितंबर में दिल्ली में BRICS सम्मेलन की मेजबानी के दौरान भारत ने इसी बहु-दिशात्मक कूटनीति का प्रदर्शन किया। सम्मेलन में चीन के शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन समेत कई देशों के नेता मौजूद थे।

भारत और चीन के बीच हालिया संवाद को हालांकि किसी नए रणनीतिक गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। दोनों देशों के बीच वास्तविक और गंभीर मतभेद अभी मौजूद हैं। भारत की अमेरिका के साथ साझेदारी भी अपनी जगह कायम है। इसलिए नई दिल्ली और वॉशिंगटन में शी जिनपिंग की लगातार दो महत्वपूर्ण यात्राओं को सीधे किसी त्रिकोणीय समझौते के रूप में देखना सही नहीं होगा।

लेकिन रणनीतिक स्तर पर यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत अब अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच एक ऐसा प्रमुख शक्ति-केंद्र है, जिसकी स्वतंत्र विदेश नीति दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। चीन भारत को अमेरिका के और करीब जाने से रोकने की कोशिश कर सकता है, जबकि अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। India Today की रिपोर्ट ने इसी संदर्भ को “India factor” के रूप में रेखांकित किया है।

यानी ट्रंप-शी बैठक का औपचारिक एजेंडा भारत नहीं है, लेकिन शी का नई दिल्ली से वॉशिंगटन जाना उस बड़े भू-राजनीतिक बदलाव की ओर जरूर इशारा करता है जिसमें भारत, अमेरिका और चीन तीनों अपने-अपने रणनीतिक हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं।

आने वाले समय में इस समीकरण का असर BRICS, हिंद-प्रशांत, वैश्विक व्यापार, तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं और भारत-अमेरिका तथा भारत-चीन संबंधों पर दिखाई दे सकता है। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत अब केवल दो बड़ी शक्तियों के बीच खड़ा देश नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र रणनीतिक स्थिति के साथ वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है।