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म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस प्रमुख बेनडिक्ट फ्रांके की भारत की कूटनीति पर बड़ी टिप्पणी: “अब भारत अपनी बात को अमल में ला रहा है”

भारत की कूटनीति पर बड़ी टिप्पणी

म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस :

बेनडिक्ट फ्रांके ने रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की भूमिका की सराहना की; कहा—मॉस्को के साथ नई दिल्ली के विशेष संबंधों का इस्तेमाल युद्ध खत्म कराने के लिए किया जा सकता है

हिंदी विंडो | अंतरराष्ट्रीय डेस्क

रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों के बीच भारत की कूटनीतिक भूमिका को लेकर म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष और सीईओ बेनडिक्ट फ्रांके ने भारत की कूटनीति पर बड़ी टिप्पणी , महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। दिल्ली में दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में फ्रांके ने कहा कि भारत लंबे समय से संवाद और कूटनीति की आवश्यकता की बात करता रहा है, लेकिन अब वह अपनी घोषित नीति को अधिक सक्रिय कूटनीतिक भूमिका के जरिए आगे बढ़ाता दिखाई दे रहा है।

फ्रांके के अनुसार, भारत के पास रूस के साथ अपने लंबे और विशेष संबंधों के कारण ऐसी कूटनीतिक क्षमता है, जिसका इस्तेमाल रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में किया जा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नई दिल्ली अपनी इस भूमिका को और मजबूत करेगी।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत द्वारा शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाने और संवाद-कूटनीति का समर्थन करने की आधिकारिक नीति स्पष्ट है; लेकिन फ्रांके द्वारा “भारत ने एक प्रस्ताव दिया है” या रूसी नेतृत्व उस प्रस्ताव को विशेष रूप से गंभीरता से ले रहा है—ये बातें फ्रांके के इंटरव्यू में किए गए दावे/आकलन हैं। इन्हें भारत सरकार की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

भारत का आधिकारिक रुख लंबे समय से यह रहा है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए। मई 2026 में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान भी प्रधानमंत्री ने यूक्रेन की स्थिति पर भारत के “संवाद और कूटनीति” वाले रुख को दोहराया था।

अगस्त 2026 में प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात के दौरान भी भारत ने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को आगे बढ़ाने की बात दोहराई। आधिकारिक भारतीय रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों नेताओं ने यूक्रेन और पश्चिम एशिया समेत विभिन्न क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की थी।

भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति पर सवाल

फ्रांके ने भारत की विदेश नीति में लंबे समय से दिखाई देने वाली multi-alignment रणनीति पर भी टिप्पणी की। उनका तर्क था कि भारत एक साथ रूस, अमेरिका, यूरोप और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रख सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संकटों के बढ़ते प्रभाव के बीच इस नीति की भी कुछ व्यावहारिक सीमाएं हैं।

उन्होंने कहा कि भारत तेजी से आर्थिक, तकनीकी और अंतरिक्ष शक्ति के रूप में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। ऐसे में उसके बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साथ कूटनीतिक जिम्मेदारियां भी बढ़ती हैं। फ्रांके का आकलन था कि भारत ने कई मुद्दों पर सही बातें कही हैं, लेकिन अब वह अपने प्रभाव और संबंधों को अधिक सक्रिय रूप से इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है।

रूस से तेल खरीद पर क्या कहा?

रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर पश्चिमी देशों में लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इस मुद्दे पर फ्रांके ने एक तरफ भारत के रूसी तेल और गैस खरीदने को स्वीकार्य बताया, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने यह भी कहा कि भारत को रूस के साथ अपने करीबी संबंधों का इस्तेमाल युद्ध समाप्त कराने के लिए करना चाहिए।

यहां भी यह समझना जरूरी है कि रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर फ्रांके की टिप्पणी उनकी व्यक्तिगत/संस्थागत राय है, भारत सरकार की नीति का आधिकारिक बयान नहीं।

भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय होती है। वहीं, युद्ध के समाधान के मामले में भारत ने लगातार संवाद और कूटनीति पर जोर दिया है।

यूरोप और अमेरिका की भूमिका पर भी जोर

फ्रांके ने केवल भारत से अधिक सक्रिय भूमिका की अपेक्षा नहीं जताई, बल्कि यूरोप, अमेरिका और एशियाई देशों के बीच सामूहिक कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे संकटों को केवल किसी एक क्षेत्र की समस्या मानकर समाधान नहीं किया जा सकता।

उनके अनुसार, वैश्विक शक्तियों के बीच “यह दूसरे की समस्या है” जैसी सोच किसी स्थायी समाधान तक पहुंचने में बाधा बन सकती है। इसलिए यूरोप, अमेरिका और एशिया को अपनी-अपनी क्षमताओं और प्रभाव का इस्तेमाल करके कूटनीतिक समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।

भारत के लिए इसका क्या अर्थ है ?

फ्रांके की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत खुद को केवल आर्थिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले देश के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

भारत के रूस और पश्चिम—दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। यही संतुलन नई दिल्ली को कई अंतरराष्ट्रीय संकटों में संवाद के लिए एक संभावित माध्यम बनाता है। लेकिन किसी भी मध्यस्थता या शांति प्रक्रिया की सफलता केवल भारत की इच्छा पर निर्भर नहीं करेगी। रूस, यूक्रेन, अमेरिका और यूरोपीय देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा किसी संभावित समझौते की शर्तें भी निर्णायक होंगी।

इसलिए फ्रांके की टिप्पणी को भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका की अंतरराष्ट्रीय सराहना के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त होने की दिशा में किसी ठोस समझौते या आधिकारिक भारतीय शांति प्रस्ताव की पुष्टि के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

भारत का आधिकारिक रिकॉर्ड फिलहाल स्पष्ट रूप से यह दिखाता है कि नई दिल्ली संघर्ष के समाधान के लिए संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में है।