हरीश रावत की यात्रा पर कांग्रेस में घमासान !
कांग्रेस ने मांगा समन्वय, हरीश रावत दिल्ली तलब; उत्तराखंड चुनाव से पहले संगठनात्मक एकजुटता पर बढ़ा दबाव
देहरादून/नई दिल्ली | 5 अक्टूबर 2026
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर पार्टी नेतृत्व और उनके बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने रावत से ऐसी गतिविधियों को रोकने का आग्रह किया है, जबकि कांग्रेस महासचिव संगठन केसी वेणुगोपाल ने उन्हें दिल्ली बुलाया है। दूसरी ओर, रावत ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया है कि वह अपनी यात्रा को जारी रखने के पक्ष में हैं।
क्या है पूरा मामला ?
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, हरीश रावत उत्तराखंड में लोगों से सीधे संवाद और राजनीतिक संपर्क बढ़ाने के लिए ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ निकाल रहे हैं। यात्रा के अलग-अलग चरणों में हरिद्वार और कुमाऊं क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में कार्यक्रम प्रस्तावित रहे हैं। ताजा रिपोर्टों में जसपुर से हल्द्वानी तक के कार्यक्रम का उल्लेख है।
कांग्रेस नेतृत्व की मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर है कि यह कार्यक्रम प्रदेश कांग्रेस संगठन के साथ पर्याप्त समन्वय के बिना किया जा रहा है। 1 अक्टूबर को उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी कुमारी सैलजा की ओर से हरीश रावत को लिखे पत्र में कथित तौर पर कहा गया कि यात्रा के संबंध में न तो उनसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से चर्चा की गई थी। सैलजा ने आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी के एकजुट होकर आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया और समानांतर कार्यक्रमों को पार्टी हित में उचित नहीं बताया।
इसके बाद कांग्रेस महासचिव संगठन केसी वेणुगोपाल ने हरीश रावत को दिल्ली बुलाया है। रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक में पार्टी की एकजुटता, संगठन के साथ समन्वय और आगामी चुनावों की रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है।
रावत का रुख क्या है ?
कांग्रेस नेतृत्व की आपत्ति के बावजूद हरीश रावत ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को रोकने का संकेत नहीं दिया है। उनके सार्वजनिक बयानों और सोशल मीडिया पोस्टों के हवाले से रिपोर्ट किया गया है कि वह यात्रा को उत्तराखंड में बदलाव और कांग्रेस को फिर सत्ता में लाने के उद्देश्य से जोड़ रहे हैं। एक रिपोर्ट में उनके कथन का सार यह है कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के हित में उनका संकल्प भी मजबूत है और अब यात्रा को रोकने का सवाल नहीं है।
रावत ने उत्तराखंड की बेरोजगारी, नशे की समस्या, सामाजिक असहिष्णुता, अपराध और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार जैसे मुद्दों को भी अपने राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया है। ये उनके राजनीतिक वक्तव्य हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके द्वारा उठाए गए राजनीतिक मुद्दों के रूप में देखना चाहिए।
कांग्रेस की चिंता क्यों महत्वपूर्ण है ?
उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक संगठनात्मक एकजुटता है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता की स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की चिंता स्वाभाविक रूप से चुनावी रणनीति और संगठनात्मक नियंत्रण से जुड़ती है।
कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर हरीश रावत को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल किया गया है। जुलाई 2026 में पार्टी द्वारा गठित उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की राजनीतिक मामलों की समिति में भी उनका नाम शामिल था। इससे यह स्पष्ट है कि वह अभी भी पार्टी की व्यापक राजनीतिक संरचना का हिस्सा हैं।
इसलिए मौजूदा विवाद को फिलहाल ‘कांग्रेस छोड़ने’ या ‘पार्टी से अलग होने’ के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में ऐसा कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। बल्कि मामला पार्टी संगठन और रावत की स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों के बीच समन्वय का दिखाई देता है।
विवाद की पृष्ठभूमि में ED का मामला भी
रावत की हालिया राजनीतिक सक्रियता ऐसे समय में बढ़ी है जब सितंबर में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को लेकर भी वह सार्वजनिक रूप से मुखर रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक, ED ने उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की 2016 की VPDO परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले की जांच के तहत देहरादून में कुछ ठिकानों पर तलाशी ली थी। रिपोर्टों में रावत के निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़े परिसरों का भी उल्लेख हुआ और एजेंसी द्वारा नकदी, सोना तथा महंगी घड़ियों की बरामदगी की बात कही गई।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ED की कार्रवाई और उसमें सामने आए आरोपों को किसी व्यक्ति के दोष सिद्ध होने के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। ये जांच और एजेंसी की कार्रवाई से जुड़े दावे हैं; अंतिम कानूनी निष्कर्ष सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलता है।
सितंबर में रावत ने ED की कार्रवाई को राजनीतिक संदर्भ में भी उठाया था और इसके बाद कांग्रेस के कुछ संगठनात्मक पदों से हटने की इच्छा जताई थी। हालांकि उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ने की खबरों को स्पष्ट रूप से खारिज किया था।
आगे क्या ?
अब राजनीतिक नजरें दिल्ली में होने वाली रावत और कांग्रेस नेतृत्व की संभावित बैठक पर हैं। यदि दोनों पक्षों के बीच समन्वय बनता है तो यात्रा को पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जा सकता है। दूसरी ओर, यदि रावत अपने स्वतंत्र कार्यक्रम पर कायम रहते हैं, तो उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक मतभेद और अधिक सार्वजनिक हो सकते हैं।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कांग्रेस नेतृत्व ने रावत की यात्रा पर आपत्ति जताई है, उन्हें दिल्ली बुलाया गया है और रावत ने यात्रा जारी रखने का सार्वजनिक संकेत दिया है। इसे अभी कांग्रेस से उनके अलग होने या किसी बड़े संगठनात्मक फैसले के रूप में प्रस्तुत करना जल्दबाजी होगी।
उत्तराखंड की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी मुकाबले से पहले कांग्रेस को जहां संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है, वहीं हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता अपने जनसंपर्क और राजनीतिक प्रभाव को सक्रिय रूप से इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं।
तथ्य-जांच निष्कर्ष:
- हरीश रावत की जनसंवाद/धन्यवाद यात्रा को लेकर कांग्रेस नेतृत्व ने आपत्ति जताई — पुष्ट रिपोर्टिंग।
- कुमारी सैलजा ने 1 अक्टूबर को यात्रा के समन्वय पर आपत्ति जताई — ANI-सिंडिकेटेड रिपोर्टों में दर्ज।
- केसी वेणुगोपाल ने रावत को दिल्ली बुलाया — कई स्वतंत्र रिपोर्टों में पुष्ट।
- रावत यात्रा जारी रखने के पक्ष में हैं — उनके सार्वजनिक बयानों/पोस्टों पर आधारित रिपोर्टिंग।
- रावत ने कांग्रेस छोड़ी है — ऐसा कोई पुष्ट तथ्य उपलब्ध नहीं; पूर्व में उन्होंने ऐसी अटकलों को खारिज किया था।
हिंदी विंडो संपादकीय नोट: इस खबर में कांग्रेस, हरीश रावत और ED से जुड़े बयानों को उनके संबंधित स्रोतों/पक्षों के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। किसी आरोप को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।












