पंजाब यूनिवर्सिटी ने करक्यूमिन की bioavailability बढ़ाने के लिए solid lipid nanoparticle technology विकसित की है। जानिए 900 गुना bioavailability का दावा क्या है और इसका मतलब क्या नहीं है।
चंडीगढ़ | हिंदी विंडो रिसर्च डेस्क
हल्दी भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाला एक बेहद सामान्य मसाला है, लेकिन इसके भीतर मौजूद करक्यूमिन (Curcumin) लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए खास रुचि का विषय रहा है। करक्यूमिन में एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गतिविधियों को लेकर अनेक वैज्ञानिक अध्ययन हो चुके हैं।
लेकिन करक्यूमिन के सामने एक बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है—इसे शरीर द्वारा पर्याप्त मात्रा में अवशोषित कराना।
करक्यूमिन पानी में आसानी से नहीं घुलता और शरीर में पहुंचने के बाद इसका एक हिस्सा तेजी से मेटाबोलाइज या degrade हो सकता है। इसी वजह से किसी पदार्थ के संभावित गुणों के बावजूद उसकी bioavailability यानी शरीर के लिए उपलब्ध मात्रा सीमित रह सकती है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के शोधकर्ताओं ने करक्यूमिन को बहुत छोटे solid lipid nanoparticles में समाहित करने की तकनीक विकसित की है। इस तकनीक का उद्देश्य करक्यूमिन को अधिक स्थिर बनाना और शरीर तक इसकी डिलीवरी बेहतर करना है।
इस तकनीक से संबंधित आविष्कार को अमेरिका में U.S. Patent No. 12,599,572 मिला है। पेटेंट के रिकॉर्ड के अनुसार इसके आविष्कारकों में प्रो. इंदु पाल कौर, वंदिता कक्कड़, सिमरजोत कौर संधू और तनवी गुप्ता शामिल हैं तथा पेटेंट का assignee Panjab University, Chandigarh है। अमेरिकी पेटेंट 14 अप्रैल 2026 को grant हुआ।
करक्यूमिन की समस्या आखिर क्या है ?
साधारण करक्यूमिन पानी में अच्छी तरह नहीं घुलता। इसके कारण इसे शरीर में लेने के बाद इसकी सीमित मात्रा ही systemic circulation तक पहुंच पाती है।
वैज्ञानिक भाषा में इसे poor oral bioavailability कहा जाता है।
यानी किसी पदार्थ में संभावित जैविक गतिविधि होना एक बात है और उसका पर्याप्त मात्रा में शरीर के उस हिस्से तक पहुंचना दूसरी बात।
पंजाब यूनिवर्सिटी की तकनीक इसी दूसरी समस्या पर काम करती है।
नैनोपार्टिकल तकनीक कैसे काम करती है ?
शोधकर्ताओं ने करक्यूमिन को बेहद छोटे lipid-based particles में समाहित करने का तरीका विकसित किया है।
इन्हें solid lipid nanoparticles यानी SLNs कहा जाता है।
सरल उदाहरण से समझें तो सामान्य करक्यूमिन को अकेले भेजने के बजाय उसे एक बेहद छोटे ‘वाहक’ के भीतर रखा जाता है। इससे उसकी पानी में dispersion, stability और शरीर में उपलब्धता को बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है।
पेटेंट दस्तावेज के अनुसार इस formulation में करक्यूमिन nanoparticles का आकार लगभग 20 से 800 nanometres के बीच हो सकता है और formulation में curcumin entrapment efficiency भी काफी अधिक बताई गई है।
900 गुना अधिक जैवउपलब्धता का दावा क्या बताता है ?
इस खबर का सबसे चर्चित हिस्सा है—900 गुना से अधिक relative bioavailability।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्पाद में सामान्य हल्दी या करक्यूमिन की तुलना में 900 गुना ज्यादा करक्यूमिन मौजूद है।
Bioavailability का अर्थ है कि किसी पदार्थ को लेने के बाद उसकी कितनी मात्रा शरीर के लिए उपलब्ध होती है।
Dainik Tribune की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब यूनिवर्सिटी की टीम ने 20 मिलीलीटर के oral shot के रूप में formulation तैयार किया और प्रयोगों में सामान्य curcumin powder के मुकाबले इसकी relative bioavailability 900 गुना से अधिक बताई गई।
इसलिए इस आंकड़े को experimental formulation result के रूप में समझना चाहिए, न कि मनुष्यों में 900 गुना अधिक चिकित्सीय प्रभाव के रूप में।
सैशे वाली formulation भी
टीम ने पानी में मिलाकर इस्तेमाल किए जा सकने वाले sachet formulation पर भी काम किया है।
रिपोर्ट के अनुसार प्रयोगों में इस formulation की relative bioavailability में लगभग 890 गुना वृद्धि दर्ज की गई।
इसे पानी, दूध या जूस जैसे पेय में मिलाने की संभावना बताई गई है।
केवल absorption ही नहीं, stability पर भी काम
इस तकनीक का उद्देश्य केवल करक्यूमिन को शरीर तक पहुंचाना नहीं है।
पेटेंट में formulation की photostability तथा अलग-अलग pH परिस्थितियों में degradation से सुरक्षा का भी उल्लेख है। पेटेंट आवेदन में करक्यूमिन के half-life को कुछ परिस्थितियों में बढ़ाने और formulation को कमरे के तापमान पर तथा refrigeration conditions में स्थिर रखने संबंधी दावे भी दर्ज हैं।
क्या इससे कैंसर, गठिया या दूसरी बीमारियों का इलाज होगा ?
अभी ऐसा दावा करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
करक्यूमिन पर विभिन्न प्रयोगशाला और पशु-अध्ययन हुए हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं ने भी curcumin-loaded solid lipid nanoparticles को लेकर bioavailability तथा delivery पर लंबे समय से काम किया है। 2011 के एक अध्ययन में SLN formulation के माध्यम से curcumin की oral bioavailability बढ़ाने की दिशा में परिणाम प्रकाशित हुए थे।
2013 के एक अध्ययन में researchers ने curcumin-loaded SLNs के brain delivery की proof-of-concept जांच भी की थी।
लेकिन laboratory या animal studies के परिणामों को सीधे मनुष्यों में किसी बीमारी के इलाज का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मनुष्यों में प्रभाव और सुरक्षा साबित करने के लिए उचित clinical trials, regulatory evaluation और अन्य वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक होंगे।
करीब दो दशक से चल रहा शोध
करक्यूमिन की delivery और bioavailability से जुड़े इस research programme का आधार नया नहीं है। Panjab University के शोधकर्ताओं ने वर्षों से solid lipid nanoparticle आधारित curcumin delivery पर वैज्ञानिक शोध और पेटेंट कार्य किया है। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में इस technology से संबंधित patent filing भी दर्ज है।
अब आगे क्या?
अमेरिका में patent grant होने के बाद अगली चुनौती laboratory research को बड़े पैमाने पर commercial technology में बदलने की होगी।
इसके लिए industrial licensing, बड़े स्तर पर manufacturing, regulatory requirements और संभावित industry partners की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
सबसे अहम बात यह है कि यह तकनीक करक्यूमिन की delivery और bioavailability की समस्या को संबोधित करती है—इसे फिलहाल किसी बीमारी के सिद्ध इलाज के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
हिंदी विंडो फैक्ट चेक निष्कर्ष:
दावा: पंजाब यूनिवर्सिटी ने करक्यूमिन delivery की नई nanoparticle technology विकसित की और अमेरिकी पेटेंट प्राप्त किया।
स्थिति: ✅ सत्यापित
महत्वपूर्ण संदर्भ: 900+ गुना आंकड़ा experimental relative bioavailability से जुड़ा है; इसे मानव उपचार में 900 गुना प्रभाव नहीं समझना चाहिए।
#HindiWindow #Curcumin #Turmeric #PanjabUniversity #Nanotechnology #HealthScience #ScienceNews #Research #IndianScience #MedicalResearch












