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देश का पहला परमवीर चक्र, सियाचिन की पहली फतह और ‘फाइटिंग फोर्थ’ का गौरवशाली इतिहास… जानिए 4 Kumaon Regiment और लेफ्टिनेंट जनरल एम.एम. लखेड़ा की विरासत

फ़ोटो-AI

4 Kumaon Regiment …

उत्तराखंड के गौरव, पूर्व राज्यपाल एवं भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मदन मोहन लखेड़ा जी के निधन का समाचार ...

देहरादून। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल से निकलकर भारतीय सेना  4 Kumaon Regiment और संवैधानिक पदों तक अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मदन मोहन लखेड़ा अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका निधन केवल एक पूर्व राज्यपाल या वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का जाना नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य परंपरा की एक गौरवशाली कड़ी का अवसान भी माना जा रहा है।

लेफ्टिनेंट जनरल लखेड़ा का सबसे गहरा संबंध भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 4 Kumaon Regiment से रहा, जिसे सेना में सम्मानपूर्वक “फाइटिंग फोर्थ” कहा जाता है।

यही वह बटालियन है जिसने स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला परमवीर चक्र अर्जित किया और बाद में दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय तिरंगा स्थापित करने वाले ऐतिहासिक ऑपरेशन मेघदूत में अग्रिम भूमिका निभाई।

कौन थे लेफ्टिनेंट जनरल मदन मोहन लखेड़ा ?

1937 में टिहरी गढ़वाल के जाखंड गांव में जन्मे लखेड़ा ने देहरादून स्थित राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज (RIMC) तथा राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) से सैन्य शिक्षा प्राप्त की।

1958 में भारतीय सेना में कमीशन मिलने के बाद उन्होंने—

गोवा मुक्ति अभियान (1961)
भारत-पाक युद्ध (1965)
भारत-पाक युद्ध (1971)
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान

सहित अनेक महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में भूमिका निभाई।

बाद में वे भारतीय सेना के Adjutant General बने तथा पुडुचेरी के उपराज्यपाल और मिजोरम के राज्यपाल भी रहे।

क्यों खास है 4 कुमाऊं?

भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित इन्फैंट्री बटालियनों में शामिल 4 कुमाऊं का इतिहास लगभग ढाई शताब्दी पुराना माना जाता है।

इस बटालियन ने—

* कश्मीर युद्ध

* गोवा मुक्ति

* सियाचिन

* आतंकवाद विरोधी अभियानों

में उल्लेखनीय योगदान दिया।

पहला परमवीर चक्र

1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों ने कश्मीर पर हमला किया।

बडगाम की लड़ाई में मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपने घायल हाथ के बावजूद मोर्चा संभाला।

करीब 700 हमलावरों से घिरे होने के बावजूद उन्होंने अंतिम सांस तक लड़ाई जारी रखी।

उनका प्रसिद्ध संदेश आज भी भारतीय सेना की प्रेरणा माना जाता है—

“मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा। आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक लड़ूंगा।”

उनके सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें स्वतंत्र भारत का पहला परमवीर चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया गया।

सियाचिन की पहली जीत

1984 में पाकिस्तान की गतिविधियों को देखते हुए भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत शुरू किया।

इस मिशन की अग्रिम टुकड़ी थी—

4 कुमाऊं।

रेडियो साइलेंस रखते हुए भारतीय सैनिकों ने बर्फीले पहाड़ों को पार किया और—

बिलाफोंड ला
साल्टोरो रिज

जैसी सामरिक चोटियों पर पहले कब्जा कर लिया।

जब पाकिस्तान ने अपना अभियान शुरू किया तब तक भारतीय सेना सभी प्रमुख चोटियों पर मजबूती से तैनात हो चुकी थी।

यही बढ़त आज तक सियाचिन में भारत की रणनीतिक स्थिति की आधारशिला मानी जाती है।

लखेड़ा और “फाइटिंग फोर्थ”

लेफ्टिनेंट जनरल लखेड़ा ने 1975 से 1978 के बीच 4 कुमाऊं की कमान संभाली।

उनके नेतृत्व में बटालियन ने पर्वतीय युद्ध प्रशिक्षण, अनुशासन और संचालन क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

यद्यपि ऑपरेशन मेघदूत के समय वे ब्रिगेड स्तर की जिम्मेदारी निभा रहे थे, लेकिन 4 कुमाऊं की गौरवशाली सैन्य परंपरा से उनका संबंध हमेशा बना रहा।

क्यों याद रखी जाएगी यह विरासत?

आज जब भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा और सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब 4 कुमाऊं जैसी इकाइयों और लेफ्टिनेंट जनरल लखेड़ा जैसे सैन्य नेतृत्व की विरासत नई पीढ़ी को साहस, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देती है।