भारत ने कहा—द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था आज की दुनिया का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करती। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए ठोस प्रक्रिया और समय-सीमा जरूरी।
हिंदी विंडो | अंतरराष्ट्रीय डेस्क
नई दिल्ली/संयुक्त राष्ट्र, 23 अक्टूबर 2026।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना और उसकी वैश्विक प्रतिनिधित्व क्षमता को लेकर भारत ने एक बार फिर सवाल उठाए हैं। भारत का कहना है कि लगभग आठ दशक पहले हुए द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के आधार पर बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आज की बदलती दुनिया की वास्तविकताओं के अनुरूप देखना जरूरी है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने महासभा में अपने वक्तव्य के दौरान सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना और उसमें सुधार की धीमी प्रक्रिया पर चिंता जताई। उन्होंने तर्क दिया कि अतीत के युद्ध में मिली जीत अपने आप में आज की वैश्विक व्यवस्था की वैधता और प्रतिनिधित्व संबंधी सवालों का स्थायी समाधान नहीं हो सकती।
1945 की व्यवस्था और आज की दुनिया
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई थी। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना, देशों के बीच सहयोग विकसित करना और भविष्य में बड़े युद्धों की आशंका कम करना था।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। इन पांचों के पास महत्वपूर्ण विषयों पर वीटो का अधिकार है। परिषद में दस अस्थायी सदस्य भी होते हैं, जिन्हें सीमित कार्यकाल के लिए चुना जाता है।
भारत का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित कई क्षेत्रों की बदलती भूमिका और जनसंख्या, अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक योगदान का पर्याप्त प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता। इसी कारण भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसकी कार्यप्रणाली में सुधार की मांग करता रहा है।
युद्ध में भारत के योगदान का उल्लेख
पी. हरीश ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग 25 लाख भारतीयों ने युद्ध में भाग लिया था और करीब 90 हजार लोगों की सैन्य सेवा के दौरान मृत्यु हुई थी।
उन्होंने औपनिवेशिक शासन की युद्धकालीन नीतियों और बंगाल के अकाल का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट में उनके वक्तव्य के हवाले से कहा गया कि इस अकाल में 40 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
इन ऐतिहासिक आंकड़ों को उनके वक्तव्य और रिपोर्ट के संदर्भ में समझना चाहिए। अलग-अलग ऐतिहासिक अध्ययनों में युद्धकालीन भारतीय सैन्य भागीदारी, सैन्य मौतों और बंगाल अकाल से जुड़ी मृत्यु-संख्या के अनुमान अलग हो सकते हैं। इसलिए इन आंकड़ों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि महत्वपूर्ण है।
भारत की व्यापक दलील यह है कि वैश्विक संस्थाओं की मौजूदा संरचना पर विचार करते समय उन देशों और समुदायों के योगदान तथा अनुभवों को भी महत्व दिया जाना चाहिए, जिनकी भूमिका ऐतिहासिक रूप से निर्णायक रही है।
सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया क्यों अटकी है ?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का प्रश्न केवल स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें यह तय करना भी शामिल है कि नए सदस्य कौन हों, स्थायी और अस्थायी सदस्यों का अनुपात क्या हो तथा वीटो अधिकार में कोई बदलाव किया जाए या नहीं।
इन मुद्दों पर सदस्य देशों के हित अलग-अलग हैं। कुछ देश स्थायी सदस्यता का विस्तार चाहते हैं, जबकि दूसरे देश क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए अलग मॉडल का समर्थन करते हैं। वीटो के अधिकार और नई स्थायी सदस्यता की शर्तें भी बहस के प्रमुख विषय हैं।
सुधार पर बातचीत संयुक्त राष्ट्र की अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया—Intergovernmental Negotiations (IGN)—के माध्यम से होती है। भारत का कहना है कि इस प्रक्रिया को ठोस दस्तावेज, स्पष्ट दिशा और समय-सीमा के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
पी. हरीश ने प्रक्रियात्मक बाधाओं की आलोचना की और कहा कि बातचीत शुरू करने के लिए आधारभूत दस्तावेज आवश्यक है; उसे बातचीत का अंतिम परिणाम बनने तक टालते रहना उचित नहीं है।
‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ समूह का विवाद
रिपोर्ट में इटली के नेतृत्व वाले ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (Uniting for Consensus—UfC) समूह का भी उल्लेख है। इसमें पाकिस्तान सहित कुछ देश शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस समूह ने सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए प्रस्तावित दस्तावेज को अपनाने पर आपत्ति जताई।
इस मुद्दे पर मतभेद संयुक्त राष्ट्र में सुधार की व्यापक चुनौती को दर्शाते हैं। एक ओर भारत सहित कई देश सुरक्षा परिषद की संरचना को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की वकालत करते हैं, वहीं दूसरे देश स्थायी सदस्यता के विस्तार के विकल्पों और उसके संभावित परिणामों पर अलग दृष्टिकोण रखते हैं।
इस विवाद को केवल दो देशों के बीच मतभेद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया की प्रमुख सुरक्षा संस्था में शक्ति का वितरण किस तरह हो और निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी समावेशी हो।
भारत की मांग का वैश्विक महत्व
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन करता आया है। भारत की दलील है कि दुनिया की वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं 1945 से काफी अलग हैं। इसलिए वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में व्यापक प्रतिनिधित्व की जरूरत है।
हालांकि, सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रक्रियाओं के अनुरूप सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति आवश्यक है। किसी भी ठोस बदलाव के लिए केवल राजनीतिक समर्थन पर्याप्त नहीं होगा; संस्थागत और प्रक्रियात्मक शर्तों को भी पूरा करना होगा।
आगे क्या ?
सुरक्षा परिषद में सुधार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश वार्ता की प्रक्रिया, प्रस्तावित मॉडल, स्थायी सदस्यता के विस्तार और वीटो जैसे मुद्दों पर कितनी सहमति बना पाते हैं।
भारत के हालिया वक्तव्य ने इस बहस को फिर रेखांकित किया है कि क्या 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने वाली संस्था को आठ दशक पुरानी शक्ति-संरचना के आधार पर ही संचालित किया जाना चाहिए।
यह बहस केवल भारत की स्थायी सदस्यता तक सीमित नहीं है। इसका संबंध संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता, वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय फैसलों में सदस्य देशों की भागीदारी से भी है।
हिंदी विंडो का निष्कर्ष: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग एक लंबे समय से चली आ रही वैश्विक बहस है। भारत का ताजा वक्तव्य इस बहस को नई राजनीतिक स्पष्टता देता है, लेकिन वास्तविक बदलाव के लिए सदस्य देशों के बीच सहमति और औपचारिक संस्थागत प्रक्रिया जरूरी होगी।












