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हरिद्वार में होटल कारोबारी से ₹50 लाख की कथित साइबर ठगी का आरोप, ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर कराए गए ट्रांसफर

हरिद्वार में होटल कारोबारी से ₹50 लाख की “कथित साइबर ठगी”

आधार कार्ड से बैंक खाता खुलने और ₹6.80 करोड़ के लेनदेन का दावा; IMO ऐप पर संपर्क कर ED और अदालत के नाम से डराने की शिकायत

तिथि: 19 अक्टूबर 2026 |

हरिद्वार। उत्तराखंड के हरिद्वार में एक होटल कारोबारी से कथित तौर पर ₹50 लाख की साइबर ठगी का मामला सामने आया है। ठगों ने कथित रूप से खुद को जांच एजेंसियों से जुड़ा बताकर कारोबारी और उनके परिवार को गिरफ्तारी का डर दिखाया। शिकायत के अनुसार, आरोपितों ने दावा किया कि कारोबारी के आधार कार्ड का इस्तेमाल दिल्ली में बैंक खाता खोलने के लिए किया गया है और उस खाते में ₹6.80 करोड़ का लेनदेन हुआ है। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में होने की बात कहकर दूसरों से संपर्क न करने का दबाव बनाया गया और बैंक से रकम ट्रांसफर कराई गई। इस मामले में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।

फोन कॉल से शुरू हुई कथित ठगी

दैनिक जागरण की 19 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, शिकायतकर्ता सनोज ने बताया कि 14 अक्टूबर को उनके पति रवि कुमार के मोबाइल फोन पर एक कॉल आई। फोन करने वाले व्यक्ति ने कहा कि उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज है। जब इसकी वजह पूछी गई, तो कथित तौर पर बताया गया कि उनके आधार कार्ड से दिल्ली के कनॉट प्लेस नहीं, बल्कि रिपोर्ट में उल्लेखित दरियागंज क्षेत्र से जुड़े कैनरा बैंक खाते का संबंध है और मामले की जानकारी दिल्ली पुलिस की ओर से दी जाएगी।

इसके बाद विजय खन्ना नाम के व्यक्ति ने कथित तौर पर संपर्क किया। शिकायत में बताया गया कि फोन करने वाले ने जेट एयरवेज के पूर्व मालिक नरेश गोयल और कैनरा बैंक से जुड़े कथित वित्तीय गबन का जिक्र किया। यह दावा भी किया गया कि 247 एटीएम कार्ड इस्तेमाल किए गए थे और उनमें रवि कुमार का आधार कार्ड भी जुड़ा हुआ था।

इसके बाद कथित तौर पर बताया गया कि संबंधित बैंक खाते में ₹6.80 करोड़ का लेनदेन हुआ है। इन दावों से पीड़ित परिवार पर कानूनी कार्रवाई का डर बढ़ा। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में इन कथित बैंक लेनदेन या आधार कार्ड के दुरुपयोग की स्वतंत्र पुष्टि नहीं दी गई है। इसलिए इन बातों को शिकायत में लगाए गए आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

IMO ऐप पर संपर्क, ED और अदालत के नाम का इस्तेमाल

शिकायत के अनुसार, कथित ठगों ने परिवार को एक फॉर्म भेजकर उसे भरने के लिए कहा। इसके बाद रवि कुमार से IMO ऐप डाउनलोड कराया गया। रिपोर्ट में बताया गया है कि 15 अक्टूबर को राहुल गुप्ता नाम के व्यक्ति ने IMO ऐप के माध्यम से संपर्क किया और खुद को प्रवर्तन निदेशालय (ED) के कार्यालय से जुड़ा बताया।

कथित तौर पर कहा गया कि मामला अदालत में पेश किया जाएगा। भरोसा पैदा करने और डर बढ़ाने के लिए पांच पन्नों की एक PDF फाइल भी भेजी गई, जिसमें अदालत की कार्रवाई से जुड़ी बातें लिखी होने का दावा किया गया।

यह तरीका साइबर अपराध के उन मामलों से मिलता-जुलता है जिनमें अपराधी पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसियों या अन्य सरकारी विभागों का नाम लेकर लोगों को डराते हैं। वे फर्जी दस्तावेजों, मनगढ़ंत आरोपों और कानूनी कार्रवाई की धमकी का इस्तेमाल करके पीड़ित को जल्दबाजी में आर्थिक फैसला लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

हालांकि, इस विशेष मामले में भेजी गई PDF की वास्तविकता, कथित कॉल करने वालों की पहचान और किसी सरकारी एजेंसी से उनके संबंध की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में नहीं है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ बताकर संपर्क सीमित करने का आरोप

रिपोर्ट के अनुसार, कथित ठगों ने रवि कुमार से कहा कि वह डिजिटल अरेस्ट में हैं और किसी अन्य व्यक्ति से न मिलें तथा न ही किसी से बातचीत करें। इसके बाद उनसे बैंक खातों की जानकारी मांगी गई।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कारोबारी को IDBI बैंक में जमा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) तुड़वाकर ₹50 लाख ट्रांसफर करने के लिए कहा गया। पीड़ित पक्ष के अनुसार, रकम ट्रांसफर कर दी गई। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि रकम एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के खाते में भेजी गई, जिसके बाद परिवार को संदेह हुआ।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के जरिए कानूनी रूप से हिरासत में नहीं लिया जा सकता। केवल किसी कॉलर के दावा करने, वर्दी या सरकारी लोगो दिखाने अथवा PDF भेजने से उसकी पहचान और अधिकार प्रमाणित नहीं होते।

भारत सरकार ने भी लोगों को इस प्रकार की धोखाधड़ी से सावधान किया है। प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम से संबंधित 27 अक्टूबर 2024 की सूचना में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने बताया था कि धोखेबाज पुलिस, CBI, नारकोटिक्स विभाग या RBI के अधिकारी बनकर लोगों को वीडियो कॉल पर धमकाते हैं। उसी सरकारी सूचना में स्पष्ट किया गया कि कोई सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से इस तरह जांच नहीं करती।

साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट में किसी आरोपित की गिरफ्तारी, ₹50 लाख की बरामदगी, बैंक खातों को फ्रीज किए जाने या रकम वापस मिलने की पुष्टि नहीं है।

इसलिए फिलहाल खबर का केंद्रीय तथ्य यह है कि होटल कारोबारी के परिवार ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ₹50 लाख की कथित ठगी की शिकायत की है और मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू होने की जानकारी दी गई है। आगे की जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि धन किन खातों में पहुंचा, खाते किसके नियंत्रण में थे और इस घटना में कितने लोग शामिल थे।

डिजिटल अरेस्ट ठगी से कैसे बचें ?

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत साइबर अपराध से संबंधित सरकारी तंत्र और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल ने इस तरह की ठगी के बारे में चेतावनी जारी की है। 6 मार्च 2025 की आधिकारिक एडवाइजरी में बताया गया कि अपराधी पुलिस, CBI, नारकोटिक्स विभाग, RBI, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को धमकाते हैं।

Cyber Crime Investigation Portal

ऐसी स्थिति में इन सावधानियों का पालन करें:

  • घबराकर पैसे ट्रांसफर न करें। गिरफ्तारी या संपत्ति जब्त करने की धमकी देकर तत्काल भुगतान की मांग को गंभीर चेतावनी मानें।

  • कॉलर की पहचान स्वतंत्र रूप से जांचें। फोन पर बताए गए नंबर के बजाय संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट से संपर्क विवरण लें।

  • OTP, PIN, पासवर्ड और बैंक विवरण साझा न करें। अज्ञात व्यक्तियों को खाते की जानकारी या स्क्रीन शेयरिंग की अनुमति न दें।

  • परिवार या विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें। आपको सबसे अलग रखने का दबाव ठगी की आशंका बढ़ाता है।

  • फर्जी दस्तावेजों पर भरोसा न करें। सरकारी लोगो, मुहर या कानूनी भाषा वाली PDF भी नकली हो सकती है।

  • धन का नुकसान होने पर तुरंत शिकायत करें। राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, तत्काल रिपोर्टिंग से धन के आगे हस्तांतरण को रोकने में मदद मिल सकती है।

हरिद्वार का यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर ठगी करने वाले केवल तकनीकी कमजोरियों का नहीं, बल्कि लोगों के डर और भरोसे का भी फायदा उठाते हैं। किसी व्यक्ति पर गंभीर अपराध का आरोप लगाने, केंद्रीय एजेंसी का नाम लेने और अदालत की कार्रवाई का डर दिखाने से कोई कॉल वास्तविक सरकारी कार्रवाई नहीं बन जाती।

नागरिकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे दबाव में आकर आर्थिक फैसला न लें, कथित सरकारी अधिकारियों की पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें और संदिग्ध गतिविधि की तुरंत रिपोर्ट करें। वहीं, इस मामले में ₹50 लाख की कथित ठगी, धन की बरामदगी और आरोपितों की पहचान से जुड़े अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकेंगे।