हिंदी विंडो

हिंदी में दुनिया, दुनिया में हिंदी…!

Advertisement

कुल्लू दशहरा, कनाडा के पार्लियामेंट हिल में मिला हिमाचली संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच

हिंदी विंडो हिंदी विंडो हिंदी में दुनिया, दुनिया में हिंदी…!
कुल्लू दशहरा :

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वर्चुअल संबोधन में भारतीय संस्कृति और ‘विविधता में एकता’ का संदेश दिया; 35 से अधिक भारत-कनाडा संगठनों के सहयोग से हुआ आयोजन

ओटावा/शिमला, 19 अक्टूबर 2026।

हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत  ‘कुल्लू दशहरा ‘और लोक परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की दिशा में कनाडा की राजधानी ओटावा में एक विशेष आयोजन किया गया। यहां स्थित पार्लियामेंट हिल में विश्व प्रसिद्ध कुल्लू दशहरा की सांस्कृतिक झलक पेश की गई। कार्यक्रम में हिमाचली लोकनृत्य, रामलीला और पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता को सामने रखा गया। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वीडियो संदेश के माध्यम से कार्यक्रम को संबोधित किया और विदेशों में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रयासों की सराहना की।

डीडी न्यूज़ की 18 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इस आयोजन का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान, आध्यात्मिक परंपराओं और लोक कलाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना था। कार्यक्रम का आयोजन हिमाचाली प्रवासी ग्लोबल एसोसिएशन (HPGA) ने किया। इसकी मेजबानी कनाडा की ऑरलियन्स क्षेत्र की सांसद मैरी-फ्रांस लालोंडे ने की। आयोजन में 35 से अधिक भारत-कनाडाई संगठनों ने सहयोग दिया।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने दिया संस्कृति और एकता का संदेश

अपने वीडियो संबोधन में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदायों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय त्योहारों, संस्कृति और परंपराओं को उत्साह से मनाया जाना भारतीय सभ्यता के मूल्यों और ‘विविधता में एकता’ की विरासत को दर्शाता है।

मुख्यमंत्री ने दशहरा को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बताते हुए सही के पक्ष में निर्भीकता से खड़े होने का संदेश दिया। उनके अनुसार, यह पर्व धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष में अंततः धर्म की विजय की सीख देता है।

सुक्खू ने HPGA के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन विदेशों में रहने वाले हिमाचलियों को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ राज्य की संस्कृति, पर्यटन क्षमता और परंपराओं को व्यापक पहचान दिलाने में सहायक हो सकते हैं।

नाटी, झमकरा और रामलीला रहे सांस्कृतिक आकर्षण

कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक लोकनृत्य नाटी और झमकरा प्रस्तुत किए गए। रामलीला का मंचन भी आयोजन का प्रमुख हिस्सा रहा। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से हिमाचली लोकजीवन, भारतीय धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की झलक कनाडा में उपस्थित लोगों तक पहुंचाई गई।

कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक व्यंजन भी परोसे गए। इनमें राज्य की प्रसिद्ध पारंपरिक भोजन परंपरा ‘धाम’ का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है। इस तरह आयोजन केवल धार्मिक पर्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें लोककला, खानपान और सामुदायिक भागीदारी को भी स्थान मिला।

विदेशों में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों का एक महत्वपूर्ण पक्ष नई पीढ़ी को अपनी विरासत से परिचित कराना है। प्रवासी परिवारों के बच्चे अक्सर ऐसे वातावरण में बड़े होते हैं, जहां स्थानीय संस्कृति और भारतीय परंपराओं के बीच संतुलन बनाना उनके लिए महत्वपूर्ण होता है। लोकनृत्य, रामलीला और पारंपरिक भोजन जैसी गतिविधियां इस सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करने का माध्यम बन सकती हैं।

35 से अधिक संगठनों की भागीदारी

डीडी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यक्रम में भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्य, विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश से संबंध रखने वाले लोग, सामुदायिक नेता, संस्कृति प्रेमी और अन्य आमंत्रित अतिथि शामिल हुए। 35 से अधिक भारत-कनाडाई संगठनों के सहयोग ने आयोजन को सामुदायिक भागीदारी का स्वरूप दिया।

ऐसी पहलें प्रवासी समुदायों के बीच आपसी संपर्क मजबूत करने के साथ अपने मूल राज्य की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में योगदान दे सकती हैं। हालांकि, आयोजन के दीर्घकालिक पर्यटन या आर्थिक प्रभाव को लेकर कोई विशिष्ट आंकड़ा इस रिपोर्ट में नहीं दिया गया है। इसलिए इसे फिलहाल सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विरासत के प्रचार-प्रसार की पहल के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

कनाडा के प्रधानमंत्री ने भी दी शुभकामनाएं

डीडी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी कुल्लू दशहरा के अवसर पर शुभकामनाएं दीं। रिपोर्ट में उनके संदेश को सांस्कृतिक विविधता, सामुदायिक भागीदारी और कनाडा के बहुसांस्कृतिक समाज में भारत-कनाडाई समुदाय के योगदान की सराहना से जोड़ा गया है।

इस संदेश का विस्तृत आधिकारिक पाठ और संबंधित प्रधानमंत्री कार्यालय की मूल विज्ञप्ति उपलब्ध स्रोतों में स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं की गई है। इसलिए इसे डीडी न्यूज़ की रिपोर्ट के हवाले से ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

कुल्लू दशहरा की परंपरा क्यों है खास ?

हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण अलग पहचान रखता है। जहां अनेक स्थानों पर दशहरे का प्रमुख आकर्षण रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन होता है, वहीं कुल्लू में भगवान रघुनाथ की परंपरा, देवी-देवताओं की भागीदारी और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान विशेष महत्व रखते हैं।

कुल्लू के ढालपुर मैदान में आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय दशहरा स्थानीय आस्था, लोक संस्कृति और सामुदायिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र है। हिमाचल प्रदेश की आधिकारिक पर्यटन सामग्री और कुल्लू जिला प्रशासन की वेबसाइट भी इस पर्व की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करती हैं।

कनाडा में आयोजित समारोह को कुल्लू के मूल धार्मिक उत्सव का स्थानापन्न नहीं माना जाना चाहिए। यह उस सांस्कृतिक विरासत का अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतीकरण था, जिसके माध्यम से हिमाचल से दूर रहने वाले लोग अपनी परंपराओं को साझा कर सकते हैं।

सांस्कृतिक पहचान से भारत-कनाडा संबंधों तक

HPGA के निदेशक मंडल ने भी हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने और दुनिया भर में बसे हिमाचलियों के बीच संबंध मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। डीडी न्यूज़ की रिपोर्ट में भाग्य चंदर, अरुण चौहान, विवेक नाजेर, संजीव ठाकुर, आशु कालिया और पूनम गुलेरिया के नाम निदेशक मंडल के सदस्यों के रूप में दिए गए हैं।

इस आयोजन का महत्व इस बात में है कि भारतीय संस्कृति को प्रस्तुत करने के लिए केवल सरकारी मंच ही नहीं, बल्कि प्रवासी समुदाय, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक समूह भी योगदान देते हैं। ऐसे प्रयासों से विभिन्न पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद को अवसर मिलता है और भारत की क्षेत्रीय परंपराएं वैश्विक दर्शकों तक पहुंचती हैं।

कुल मिलाकर, ओटावा के पार्लियामेंट हिल में कुल्लू दशहरा का आयोजन हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति और प्रवासी भारतीयों के सांस्कृतिक जुड़ाव को सामने लाने वाली पहल के रूप में देखा जा सकता है। इसकी वास्तविक दीर्घकालिक सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि ऐसे कार्यक्रम भविष्य में सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पर्यटन संबंधों और नई पीढ़ी तक परंपराओं के हस्तांतरण को कितना प्रोत्साहित करते हैं।