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हिमालय में अंधाधुंध निर्माण से बढ़ा आपदा का खतरा, 3 लाख लोगों पर मंडरा रहा संकट

हिमालय निर्माण और आपदा चेतावनी
हिमालय में अंधाधुंध निर्माण :

नेपाल, दक्षिण-पूर्वी तिब्बत और उत्तराखंड के संवेदनशील इलाकों में सात वर्षों के दौरान निर्माण में करीब 45% की वृद्धि। हिमालय , ग्लेशियल झीलों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बढ़ते निर्माण ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई।

नई दिल्ली/देहरादून: हिमालय को भारत और दक्षिण एशिया की जीवनरेखा कहा जाता है। यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं, खेती को पानी देती हैं और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सहारा देती हैं। लेकिन यही हिमालय आज एक ऐसे खतरे का सामना कर रहा है, जिसे नजरअंदाज करना आने वाले वर्षों में बेहद महंगा पड़ सकता है। पहाड़ों में तेजी से बढ़ता निर्माण, नदी किनारे फैलती बस्तियां और बिना पर्याप्त जोखिम आकलन के विकसित होते पर्यटन स्थल अब प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को और गंभीर बना रहे हैं।

एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने हिमालयी क्षेत्र में इसी चुनौती की ओर ध्यान दिलाया है। अध्ययन के अनुसार, उत्तरी नेपाल, दक्षिण-पूर्वी तिब्बत और भारत के उत्तराखंड के एक हिस्से में बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में निर्मित भूमि का विस्तार वर्ष 2016 से 2023 के बीच लगभग 45 प्रतिशत बढ़ा। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि ग्लेशियल झीलों से संभावित बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम वाले इलाकों में निर्माण का विस्तार लगभग 78 प्रतिशत दर्ज किया गया।

इस अध्ययन के मुताबिक, विश्लेषण किए गए क्षेत्रों में करीब तीन लाख लोग संभावित आपदा जोखिम के दायरे में आ सकते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह संख्या पूरे हिमालयी क्षेत्र की कुल जोखिमग्रस्त आबादी नहीं है। अध्ययन का दायरा सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक था। इसलिए आसपास के दूसरे संवेदनशील इलाकों को शामिल किया जाए तो वास्तविक आंकड़ा और बड़ा हो सकता है।

आखिर क्यों बढ़ रहा है हिमालय में आपदा का खतरा ?

हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। यहां भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना, अचानक बाढ़ और ग्लेशियरों से जुड़ी घटनाओं का खतरा पहले से मौजूद है। जलवायु परिवर्तन ने इन चुनौतियों को और जटिल बना दिया है।

तापमान में बढ़ोतरी के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इनके पिघलने से पहाड़ों में मौजूद कई ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है। ऐसी झीलों के प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ने या टूटने की स्थिति में बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है।

इस तरह की बाढ़ सामान्य नदी बाढ़ से अलग हो सकती है। इसमें पानी के साथ भारी मात्रा में पत्थर, मलबा और मिट्टी भी नीचे की ओर बहते हैं। रास्ते में आने वाले पुल, सड़कें, मकान और दूसरी संरचनाएं कुछ ही समय में तबाह हो सकती हैं।

समस्या यह है कि हिमालय में कई बस्तियां और पर्यटन केंद्र ठीक उन्हीं नदी घाटियों में विकसित हो रहे हैं, जहां ऐसी घटनाओं का प्रभाव सबसे ज्यादा हो सकता है।

नेपाल का पोखरा: पर्यटन विकास और प्राकृतिक जोखिम की चुनौती

नेपाल का पोखरा इस समस्या का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। हिमालय की तलहटी में बसा यह शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, झीलों और अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला के कारण दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है।

लेकिन शहर के आसपास से गुजरने वाली सेती गंडकी नदी और उससे जुड़े भौगोलिक जोखिम स्थानीय प्रशासन के लिए चुनौती बने हुए हैं।

रिपोर्ट में पोखरा के मेयर धनराज आचार्य के हवाले से बताया गया है कि नदी से जुड़े जोखिमों से निपटना आसान नहीं है। कई पुरानी इमारतें नदी के किनारे से बेहद कम दूरी पर स्थित हैं। कुछ संरचनाओं की दूरी महज पांच मीटर बताई गई है।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि सामान्य दिनों में शांत दिखाई देने वाली पहाड़ी नदियां भारी बारिश, भूस्खलन या ऊपर स्थित जलस्रोतों में अचानक बदलाव के कारण कुछ ही घंटों में बेहद खतरनाक रूप ले सकती हैं।

अन्नपूर्णा ट्रेकिंग क्षेत्र में भी नदी किनारे बस्तियों और पर्यटन सुविधाओं का विस्तार हुआ है। होमस्टे, होटल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बढ़ती मांग ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को अवसर दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन निर्माणों के दौरान प्राकृतिक जोखिमों का पर्याप्त आकलन किया गया?

रिपोर्ट में स्थानीय पर्यटन कारोबार से जुड़े लोगों की चिंता भी सामने आई है। पर्यटन स्थलों का अनियोजित विस्तार और प्राकृतिक जोखिमों को नजरअंदाज करना भविष्य में स्थानीय व्यवसायों के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकता है।

ग्लेशियल झीलें: पहाड़ों में छिपा जलवायु संकट

हिमालय में ग्लेशियरों का पिघलना केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं है। इसका सीधा संबंध नीचे बसे शहरों, गांवों और करोड़ों लोगों की सुरक्षा से है।

जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो उनसे निकलने वाला पानी कई बार प्राकृतिक रूप से बनी झीलों में जमा हो जाता है। इन झीलों के आसपास बर्फ, मलबे और चट्टानों से बने प्राकृतिक अवरोध होते हैं। अत्यधिक पानी का दबाव, भूस्खलन या हिमस्खलन जैसी घटनाएं इन अवरोधों को कमजोर कर सकती हैं।

यदि झील का पानी अचानक बाहर निकलता है तो नीचे की घाटियों में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।

नेपाल में इस तरह की घटनाओं का इतिहास रहा है। अध्ययन से जुड़े विवरणों में 1940 के बाद से लगभग 30 ग्लेशियल झील विस्फोट संबंधी घटनाओं का उल्लेख किया गया है। यह आंकड़ा बताता है कि हिमालय में यह खतरा काल्पनिक नहीं, बल्कि पहले से दर्ज प्राकृतिक जोखिम है।

उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी ?

भारत के हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है। यहां गंगा, यमुना और उनकी सहायक नदियों के किनारे अनेक शहर, कस्बे और गांव बसे हुए हैं।

ऋषिकेश, देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और जोशीमठ जैसे क्षेत्रों में नदियों, पहाड़ी ढलानों और बस्तियों का संबंध बेहद नजदीकी है। पर्यटन, चारधाम यात्रा, सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं और शहरी विस्तार ने इन क्षेत्रों में विकास की गति बढ़ाई है।

विकास जरूरी है, लेकिन पहाड़ों में विकास का तरीका मैदानी इलाकों से अलग होना चाहिए। यहां किसी सड़क, होटल, पुल या आवासीय परियोजना की योजना बनाते समय भूगर्भीय स्थिति, नदी के पुराने प्रवाह क्षेत्र, भूस्खलन की आशंका और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन आवश्यक है।

उत्तराखंड में नदी किनारे निर्माण को नियंत्रित करने के लिए नियम और नियोजन संबंधी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। हालांकि, इन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन, अवैध निर्माण पर कार्रवाई और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

इसलिए नेपाल और तिब्बत से जुड़ा यह अध्ययन उत्तराखंड के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

नियम हैं, लेकिन क्या उनका पालन हो रहा है ?

विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में समस्या केवल निर्माण की गति नहीं, बल्कि नियोजन और निगरानी की कमजोरी भी है।

कई स्थानों पर पर्यटन सुविधाएं विकसित करने से पहले बाढ़ के संभावित क्षेत्र, नदी की अधिकतम जलधारा, ढलानों की स्थिरता और निकासी व्यवस्था का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया जाता। नतीजा यह होता है कि जिस स्थान पर निर्माण आर्थिक अवसर के रूप में दिखाई देता है, वही भविष्य में आपदा के समय सबसे बड़ा जोखिम बन जाता है।

नेपाल में भी नदी किनारे बस्तियों को नियंत्रित करने और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए जाने की बात सामने आई है। वहीं भारत में भी नदी क्षेत्र के नियमन और बाढ़ क्षेत्र निर्धारण की व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाने की जरूरत है।

केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। उनका पालन सुनिश्चित करना, स्थानीय निकायों को सक्षम बनाना और आम नागरिकों को जोखिम के बारे में जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है।

विकास बनाम सुरक्षा नहीं, सुरक्षित विकास की जरूरत

हिमालय में पर्यटन लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। होटल, होमस्टे, परिवहन, स्थानीय बाजार और धार्मिक पर्यटन से जुड़े व्यवसाय पहाड़ी अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं। ऐसे में निर्माण और विकास पर पूरी तरह रोक लगाना व्यावहारिक समाधान नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि विकास की योजनाएं पहाड़ों की प्राकृतिक सीमाओं को ध्यान में रखकर बनाई जाएं।

नदी के सक्रिय प्रवाह क्षेत्र में निर्माण को नियंत्रित किया जाए। ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी हो। जोखिम वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार किया जाए। समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियां विकसित हों और स्थानीय लोगों को आपदा से बचाव का प्रशिक्षण दिया जाए।

हिमालय हमें पानी, जंगल, जैव विविधता और जीवन देता है। लेकिन यदि विकास की दौड़ में इसकी प्राकृतिक संरचना को ही नजरअंदाज कर दिया गया तो इसका खामियाजा केवल पहाड़ों में रहने वाले लोगों को नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत और दक्षिण एशिया को भुगतना पड़ सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम हिमालय में विकास की रफ्तार बढ़ाने से पहले वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं? करीब तीन लाख लोगों से जुड़ी यह वैज्ञानिक चेतावनी नीति निर्माताओं, प्रशासन और समाज सभी के लिए गंभीर विचार का विषय है।

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