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उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: 17 वर्षीय किशोरी और 22 वर्षीय युवक के रिश्ते पर दर्ज POCSO FIR रद्द

कोर्ट ने कहा—सहमति वाले रिश्ते को यौन हमले के बराबर मानना उचित नहीं; परिस्थितियों को देखते हुए आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के साथ अन्याय होगा

देहरादून/नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में 17 वर्ष 2 माह की किशोरी और करीब 22 वर्ष के युवक के बीच कथित प्रेम संबंध से जुड़े POCSO मामले में दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया है। अदालत ने मामले के तथ्यों, पीड़िता के बयान, दोनों पक्षों के बीच कथित सहमति और बाद में हुए समझौते को महत्वपूर्ण माना।

न्यायमूर्ति आलोक महरा की पीठ ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में सहमति से बने रिश्ते को यौन हमले के समान मानना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि बाल संरक्षण का उद्देश्य किशोरावस्था को अपराध की श्रेणी में धकेलना नहीं हो सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला नैनीताल जिले के रामनगर थाने में दर्ज FIR से संबंधित था। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार FIR शुरुआत में BNS की धारा 140(3) के तहत दर्ज हुई थी। जांच आगे बढ़ने पर BNS की धारा 137(2), 84 और 64(2)(m) तथा POCSO Act की धाराएं 5(l) और 6 भी जोड़ी गईं।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि युवक और लड़की लंबे समय से प्रेम संबंध में थे। लड़की अपने माता-पिता को बताए बिना घर से चली गई थी, जिसके बाद शिकायत दर्ज कराई गई। मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता भी हुआ।

पीड़िता ने अदालत में क्या कहा?

रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता अदालत के समक्ष उपस्थित हुई। उसने बताया कि वह और युवक एक वर्ष से अधिक समय से प्रेम संबंध में थे और दोनों ने उसके बालिग होने के बाद विवाह करने का इरादा व्यक्त किया था।

अदालत ने उसके इस बयान के साथ-साथ इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि पीड़िता ने संबंध में बल, दबाव या गलत प्रस्तुति से इनकार किया था। शिकायतकर्ता और पीड़िता दोनों आगे आपराधिक मुकदमा नहीं चलाना चाहते थे।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने कहा कि 17 वर्ष की उम्र वाले व्यक्ति और 21 वर्ष के व्यक्ति के बीच सहमति वाले संबंध को यौन हमले के बराबर मानने से महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समाप्त हो जाते हैं और ऐसी स्थिति मनमानी की ओर ले जा सकती है।

अदालत ने इसी संदर्भ में कहा कि बाल संरक्षण का अर्थ किशोरावस्था को अपराधी बनाना नहीं है।

FIR क्यों रद्द की गई?

हाईकोर्ट ने मामले के कई पहलुओं को एक साथ देखा—पीड़िता की उम्र, उसका अदालत में दिया गया बयान, कथित संबंध की अवधि, बल या दबाव के आरोप से इनकार, दोनों पक्षों के बीच समझौता तथा आगे मुकदमा न चलाने की इच्छा।

अदालत ने माना कि इन परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना आरोपी के लिए गंभीर उत्पीड़न और अन्याय का कारण बनेगा तथा यह कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा। इसके बाद हाईकोर्ट ने FIR और उससे उत्पन्न सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

न्यायिक हिरासत में था आरोपी

रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में था। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही समझौते से संबंधित आवेदन का भी निस्तारण कर दिया गया।

एक जरूरी कानूनी बात

इस फैसले को यह समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने POCSO कानून को खत्म या कमजोर करने का कोई सामान्य सिद्धांत नहीं दिया है। यह आदेश अपने सामने मौजूद विशिष्ट तथ्यों, पीड़िता के बयान, पक्षकारों के बीच संबंध और समझौते की परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है।

इसलिए इस फैसले को हर POCSO मामले पर लागू होने वाला सामान्य नियम मानना उचित नहीं होगा।

केस: Aman Sagar Versus State of Uttarakhand
केस नंबर: WPCRL/1543/2026
न्यायालय: उत्तराखंड हाईकोर्ट
पीठ: न्यायमूर्ति आलोक महरा
मुख्य मुद्दा: सहमति वाले कथित प्रेम संबंध के संदर्भ में POCSO FIR और आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का औचित्य