नई दिल्ली | हिंदी विंडो डिजिटल डेस्क
भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए ताजमहल, भारतीय खान-पान, रंग-बिरंगी संस्कृति और भीड़भाड़ वाले बाजार आम तौर पर बड़े आकर्षण होते हैं। लेकिन फ्रांस की एक कंटेंट क्रिएटर Manika के लिए भारत की सबसे बड़ी हैरानी इनमें से कोई नहीं, बल्कि एक ऐसा डिजिटल सिस्टम रहा, जिसे अधिकांश भारतीय अब रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा मानते हैं—UPI और QR Code से भुगतान।
Manika, जो फ्रेंच यात्रियों को भारत की संस्कृति और यात्रा अनुभवों से परिचित कराने वाली कंटेंट क्रिएटर हैं, ने सोशल मीडिया पर अपने भारत दौरे का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि भारत आने से पहले वह UPI के बारे में जानती थीं, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि डिजिटल भुगतान भारतीय जीवन में इतनी गहराई तक पहुंच चुका है।
स्ट्रीट फूड से लेकर ऑटो तक—हर जगह QR
Manika के मुताबिक, भारत में उन्हें सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात ने किया कि QR Code सिर्फ बड़े मॉल, महंगे रेस्टोरेंट या शहरी दुकानों तक सीमित नहीं हैं।
छोटे स्ट्रीट-फूड स्टॉल, स्थानीय दुकानें, कैफे, छोटे कारोबारी और यहां तक कि ऑटो-रिक्शा जैसे रोजमर्रा के लेनदेन में भी QR Code के जरिए भुगतान किया जा सकता है।
यानी कुछ रुपये की चाय हो, सड़क किनारे का नाश्ता हो या छोटी दूरी का ऑटो किराया—कई जगहों पर प्रक्रिया बेहद सरल दिखाई देती है:
QR स्कैन कीजिए → भुगतान कीजिए → आगे बढ़िए।
यही सहजता Manika के लिए भारत के डिजिटल बदलाव का सबसे बड़ा अनुभव बन गई।
भारतीयों के लिए सामान्य, विदेशी के लिए डिजिटल कल्चर शॉक
दिलचस्प बात यह है कि जो अनुभव Manika के लिए बेहद असाधारण था, वह करोड़ों भारतीयों के लिए लगभग रोजमर्रा की आदत बन चुका है।
UPI को 25 अगस्त 2016 को लॉन्च किया गया था। दस वर्ष पूरे होने के मौके पर सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, FY2016-17 में UPI पर सालाना केवल 1.78 करोड़ लेनदेन हुए थे। FY2025-26 तक यह आंकड़ा बढ़कर 24,162 करोड़ लेनदेन हो गया—करीब 13,000 गुना वृद्धि।
लेनदेन की कुल राशि भी इसी अवधि में लगभग ₹0.07 लाख करोड़ से बढ़कर ₹314 लाख करोड़ पहुंच गई।
जुलाई 2026 में नया रिकॉर्ड
UPI की रफ्तार 2026 में भी जारी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में UPI ने 2,366 करोड़ लेनदेन प्रोसेस किए, जो उस समय तक इसका सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा था। इन लेनदेन का कुल मूल्य लगभग ₹29.88 लाख करोड़ रहा। 2026 में UPI पर औसतन लगभग 66 करोड़ लेनदेन प्रतिदिन हुए।
भारत के डिजिटल पेमेंट्स में UPI की 84% हिस्सेदारी
UPI की पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार के अनुसार FY2025-26 में भारत के डिजिटल पेमेंट्स के transaction volume में UPI की हिस्सेदारी 84% रही।
यानी भारत में डिजिटल भुगतान की तस्वीर में UPI अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि सबसे प्रमुख payment rails में से एक बन चुका है।
इसी व्यापक इस्तेमाल की वजह से QR Code भारतीय बाजारों में बेहद सामान्य दृश्य बन गए हैं।
741 बैंक UPI से जुड़े
UPI के विस्तार के साथ इसका बैंकिंग नेटवर्क भी तेजी से बढ़ा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, लॉन्च के शुरुआती दौर में UPI से जुड़े बैंकों की संख्या सीमित थी, जबकि जुलाई 2026 तक 741 बैंक UPI पर लाइव थे।
यह नेटवर्क विस्तार UPI को छोटे और बड़े दोनों तरह के भुगतान के लिए व्यापक रूप से उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण रहा है।
भारत से बाहर भी पहुंच रहा UPI
UPI की कहानी अब केवल भारत तक सीमित नहीं है।
अगस्त 2026 में सरकार ने बताया कि UPI 11 देशों में acceptance और/या cross-border remittances के लिए operational है। इनमें संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, भूटान, श्रीलंका, नेपाल, सिंगापुर, मॉरीशस, कतर, कंबोडिया, ग्रीस और मालदीव शामिल हैं।
फ्रांस में UPI merchant payments की शुरुआत फरवरी 2024 में हुई थी, जबकि कंबोडिया और ग्रीस जैसे देशों में 2026 के दौरान नए cross-border integrations हुए।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत का digital payment infrastructure अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विस्तार कर रहा है।
UPI सिर्फ भुगतान का तरीका नहीं, भारत की डिजिटल पहचान भी
Manika की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने किसी सरकारी रिपोर्ट या आर्थिक आंकड़े की चर्चा नहीं की। उन्होंने उस बदलाव को देखा जिसे भारतीय नागरिक शायद अब महसूस भी नहीं करते।
जहां किसी समय छोटी खरीदारी के लिए नकद रखना जरूरी समझा जाता था, वहीं आज अनेक भारतीय छोटे से छोटे भुगतान के लिए भी मोबाइल और QR Code का इस्तेमाल करते हैं।
यही बदलाव भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की गहराई को दिखाता है।
एक विदेशी पर्यटक के लिए सड़क किनारे चाय वाले से लेकर ऑटो चालक तक QR Code से भुगतान कर पाना “Wow Moment” हो सकता है।
लेकिन भारत के लिए यह अब रोजमर्रा की जिंदगी है।
यही शायद UPI की सबसे बड़ी सफलता है—तकनीक इतनी सामान्य हो जाए कि वह तकनीक जैसी महसूस ही न हो।
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