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अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस: प्रकृति के मौन प्रहरी क्यों हैं बेहद जरूरी ?

गिद्धों की घटती आबादी केवल वन्यजीव संकट नहीं, बल्कि पर्यावरण, जैव-विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चेतावनी है

हिंदी विंडो | पर्यावरण डेस्क

गिद्धों को अक्सर प्रकृति के सबसे कम आंके जाने वाले पक्षियों में गिना जाता है। लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि उनके बिना प्राकृतिक सफाई व्यवस्था का एक अहम हिस्सा कमजोर पड़ सकता है।

हर वर्ष सितंबर के पहले शनिवार को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस (International Vulture Awareness Day) मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह दिवस 5 सितंबर को मनाया गया। इसका उद्देश्य गिद्धों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और यह समझाना है कि इन पक्षियों का संरक्षण स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए क्यों जरूरी है।

गिद्ध आखिर इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं ?

गिद्ध मुख्य रूप से मृत पशुओं के शवों को खाते हैं। पहली नजर में यह भूमिका भले ही आकर्षक न लगे, लेकिन यही काम उन्हें प्रकृति का महत्वपूर्ण ‘सफाईकर्मी’ बनाता है।

किसी मृत पशु का शव यदि लंबे समय तक खुले में पड़ा रहे तो वह सड़ने के साथ रोगाणुओं और संक्रमण के संभावित स्रोतों में बदल सकता है। गिद्ध ऐसे शवों को तेजी से खाकर जैविक अवशेषों के प्राकृतिक निस्तारण में योगदान देते हैं।

इस तरह वे खाद्य-श्रृंखला और पोषक तत्वों के प्राकृतिक चक्र को बनाए रखने में मदद करते हैं। यही वजह है कि संरक्षण विशेषज्ञ गिद्धों को स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण संकेतकों में गिनते हैं।

भारत में गिद्ध संकट कितना गंभीर रहा ?

भारत में गिद्धों की संख्या में 1990 के दशक से बेहद तेज गिरावट देखी गई। विशेष रूप से व्हाइट-रम्प्ड वल्चर, लॉन्ग-बिल्ड वल्चर और स्लेंडर-बिल्ड वल्चर जैसी Gyps समूह की प्रजातियां बुरी तरह प्रभावित हुईं।

इस संकट के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) थी।

जब डाइक्लोफेनाक से उपचारित पशु की मृत्यु के बाद उसका शव गिद्ध खाते थे, तो दवा के अवशेष उनके शरीर में पहुंच जाते थे। वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस दवा और गिद्धों की भारी मृत्यु के बीच मजबूत संबंध स्थापित किया। भारत सरकार के संरक्षण दस्तावेज भी डाइक्लोफेनाक को दक्षिण एशिया में गिद्धों की भयावह गिरावट के प्रमुख कारणों में शामिल करते हैं।

सिर्फ डाइक्लोफेनाक पर रोक काफी नहीं

डाइक्लोफेनाक संकट के बाद भारत में गिद्ध संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। लेकिन विशेषज्ञों के सामने चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है।

गिद्धों को आज भी कई तरह के खतरे हैं—

  • पशु चिकित्सा में गिद्धों के लिए जहरीली दवाओं का इस्तेमाल
  • सुरक्षित भोजन की कमी
  • प्राकृतिक आवास का नष्ट होना
  • बिजली की हाई-वोल्टेज लाइनों से टकराव और करंट का खतरा
  • विषैले पदार्थ और अन्य प्रदूषक
  • मानव गतिविधियों से बढ़ता दबाव
  • जलवायु परिवर्तन के कारण आवास में संभावित बदलाव

इसलिए गिद्ध संरक्षण को केवल किसी एक दवा को प्रतिबंधित करने तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके लिए सुरक्षित भोजन, सुरक्षित आवास और सुरक्षित लैंडस्केप की पूरी व्यवस्था जरूरी है।

‘Vulture Safe Zone’ क्या है ?

गिद्ध संरक्षण की दिशा में Vulture Safe Zone यानी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।

ऐसे क्षेत्रों में कोशिश की जाती है कि गिद्धों को—

सुरक्षित भोजन + सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाएं + उपयुक्त आवास + वैज्ञानिक निगरानी

मिल सके।

भारत के Action Plan for Vulture Conservation 2020-2025 में भी गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों के विस्तार, संरक्षण प्रजनन केंद्रों की स्थापना, जहरीली पशु चिकित्सा दवाओं से बचाव और गिद्धों की आबादी की वैज्ञानिक निगरानी जैसे उपायों को प्राथमिकता दी गई थी।

पिंजौर का जटायु संरक्षण केंद्र क्यों महत्वपूर्ण है ?

हरियाणा के पंचकूला जिले के पिंजौर में स्थित जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र भारत के महत्वपूर्ण गिद्ध संरक्षण प्रयासों में शामिल है।

यहां विशेष रूप से संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों के संरक्षण प्रजनन पर काम किया गया है। उद्देश्य केवल कैद में गिद्धों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि भविष्य में उपयुक्त और सुरक्षित प्राकृतिक आवासों में उनकी आबादी को फिर से स्थापित करना है।

यही संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है—कैप्टिव ब्रीडिंग से वाइल्ड रिकवरी, यानी संरक्षण केंद्रों से गिद्धों की सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण में सफल वापसी।

जटायु नाम का सांस्कृतिक महत्व भी है

भारत में गिद्धों का महत्व केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है।

रामायण में जटायु का प्रसंग साहस, त्याग और कर्तव्य का प्रतीक माना जाता है। माता सीता की रक्षा के लिए जटायु द्वारा रावण का सामना करने की कथा भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसीलिए आधुनिक गिद्ध संरक्षण में ‘जटायु’ नाम का प्रयोग पर्यावरण संरक्षण और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बनाता है।

गिद्ध और मानव स्वास्थ्य का संबंध

गिद्ध संरक्षण को केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा।

मृत पशुओं के शवों का तेजी से प्राकृतिक निस्तारण पर्यावरणीय स्वच्छता में योगदान देता है। इसीलिए गिद्धों की मौजूदगी का संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जोड़ा जाता है।

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां पशुधन अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, गिद्धों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

2026 में संदेश क्या है ?

2026 के अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के अवसर पर वैश्विक अभियान ने एक बार फिर गिद्धों को लेकर जागरूकता और संरक्षण कार्रवाई पर जोर दिया। आधिकारिक IVAD मंच के अनुसार यह दिवस हर वर्ष सितंबर के पहले शनिवार को मनाया जाता है और 2026 में इसकी तारीख 5 सितंबर रही।

भारत में भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गिद्धों को प्रकृति की ‘क्लीन-अप टीम’ बताते हुए उनके संरक्षण, आवास बहाली और पारिस्थितिकी संतुलन की रक्षा पर जोर दिया।

आगे की राह क्या है ?

गिद्धों को बचाने के लिए संरक्षण नीति को कई स्तरों पर मजबूत करना होगा।

पहला—गिद्धों के लिए सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाओं का इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा।

दूसरा—गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों का विस्तार करना होगा।

तीसरा—मृत पशुओं के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

चौथा—बिजली लाइनों और अन्य मानव निर्मित ढांचों से पक्षियों के टकराव का खतरा कम करना होगा।

पांचवां—प्राकृतिक आवासों की रक्षा और पुनर्बहाली पर ध्यान देना होगा।

और सबसे महत्वपूर्ण—स्थानीय समुदाय, पशुपालक, पशु चिकित्सक, वैज्ञानिक, वन विभाग और आम नागरिकों को संरक्षण अभियान से जोड़ना होगा।

गिद्ध बचेंगे तो प्रकृति का संतुलन मजबूत रहेगा

गिद्धों की कहानी हमें प्रकृति का एक महत्वपूर्ण सबक देती है।

किसी जीव का सुंदर दिखना उसकी उपयोगिता का पैमाना नहीं हो सकता।

गिद्ध शायद दुनिया के सबसे आकर्षक पक्षियों में शामिल न हों, लेकिन प्रकृति के लिए उनका महत्व असाधारण है।

वे मृत पशुओं के प्राकृतिक निस्तारण में योगदान देते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ रखने में मदद करते हैं और खाद्य-श्रृंखला के एक महत्वपूर्ण हिस्से को संभालते हैं।

इसलिए गिद्धों को बचाने का अर्थ सिर्फ एक पक्षी की प्रजाति को बचाना नहीं है।

गिद्धों की उड़ान वास्तव में स्वस्थ पर्यावरण, संतुलित पारिस्थितिकी और सुरक्षित भविष्य की उड़ान है।

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