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“विवाह बनाम लिव-इन रिलेशनशिप: मोहन भागवत के बयान से फिर छिड़ी बहस, क्या बदल रही है भारत में रिश्तों की सोच?”

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया बयान ने एक बार फिर भारत में विवाह (Marriage) और लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) को लेकर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है।

भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि “विवाह व्यक्ति को जिम्मेदारी निभाना सिखाता है, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप कई बार जिम्मेदारियों से बचने का माध्यम बन जाती है।” उनके इस कथन के बाद सोशल मीडिया से लेकर शिक्षाविदों, युवाओं और सामाजिक विशेषज्ञों के बीच व्यापक चर्चा शुरू हो गई।

एक वर्ग भागवत की इस सोच का समर्थन करता है। उनका मानना है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों का सामाजिक और कानूनी बंधन है, जो दीर्घकालिक जिम्मेदारी, पारिवारिक स्थिरता और सामाजिक उत्तरदायित्व को मजबूत करता है।

वहीं दूसरी ओर कई लोग यह तर्क देते हैं कि जिम्मेदारी किसी कानूनी प्रमाणपत्र से नहीं, बल्कि रिश्ते में शामिल व्यक्तियों की सोच, परिपक्वता और आपसी प्रतिबद्धता से तय होती है। उनके अनुसार किसी भी रिश्ते की सफलता का आधार सम्मान, विश्वास, संवाद और समान भागीदारी है।

विवाह क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण?

भारतीय समाज में विवाह लंबे समय से सामाजिक संस्था के रूप में स्थापित है। विवाह के बाद पति-पत्नी को संपत्ति, उत्तराधिकार, चिकित्सा संबंधी निर्णय, भरण-पोषण और अन्य कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही परिवार, बच्चों के पालन-पोषण तथा आर्थिक जिम्मेदारियों का स्पष्ट ढांचा भी बनता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सिर्फ विवाह कर लेना किसी रिश्ते की सफलता की गारंटी नहीं है। हर विवाह को विश्वास, संवाद, समझौते और भावनात्मक परिपक्वता की आवश्यकता होती है।

लिव-इन रिलेशनशिप की बढ़ती स्वीकार्यता

बदलते शहरी समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को कुछ युवा विवाह से पहले एक-दूसरे को बेहतर समझने का अवसर मानते हैं।

एक साथ रहने से पार्टनर की जीवनशैली, आर्थिक आदतें, घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा और कठिन परिस्थितियों में व्यवहार को करीब से समझा जा सकता है।

कुछ युवा यह भी मानते हैं कि प्रेम और जिम्मेदारी सामाजिक दबाव से नहीं बल्कि आपसी सहमति और व्यक्तिगत निर्णय से तय होनी चाहिए।

कानूनी स्थिति क्या कहती है?

भारत में विभिन्न न्यायिक फैसलों के माध्यम से बालिग और सहमति से रहने वाले दो व्यक्तियों के लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दी गई है।

हालांकि विवाह की तुलना में लिव-इन संबंधों में संपत्ति, उत्तराधिकार, अलगाव और आर्थिक सुरक्षा जैसे कई विषय परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। सामाजिक स्वीकार्यता भी महानगरों और छोटे शहरों में अलग-अलग स्तर पर देखने को मिलती है।

Gen Z की बदलती सोच

नई पीढ़ी यानी Gen Z रिश्तों को लेकर पहले से अलग दृष्टिकोण रखती है।

अब सवाल केवल “शादी कब करनी है?” नहीं बल्कि “क्या यह रिश्ता स्वस्थ है?” भी बन चुका है।

भावनात्मक सामंजस्य, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक आत्मनिर्भरता, व्यक्तिगत विकास और साझा जीवन मूल्यों को कई युवा पारंपरिक समयसीमा से अधिक महत्व दे रहे हैं।

हालांकि अधिकांश सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में युवा भविष्य में विवाह करना चाहते हैं, लेकिन वे जल्दबाजी के बजाय सही समय, आर्थिक स्थिरता और रिश्ते की परिपक्वता का इंतजार करना पसंद करते हैं।

निष्कर्ष

मोहन भागवत का बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि भारतीय समाज में तेजी से बदलते रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों पर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा बन गया है।

अंततः चाहे रिश्ता विवाह से शुरू हो या लिव-इन से, उसकी सफलता का आधार विश्वास, सम्मान, संवाद, जवाबदेही और एक-दूसरे के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता ही मानी जाती है।