हिंदी विंडो | विशेष रिपोर्ट
मुमताज अली खान से ‘श्री एम’ तक: 19 साल की उम्र में हिमालय पहुंचे केरल के युवक को मिला वही गुरु, जिसकी तलाश थी
कहानी एक ऐसे बच्चे से शुरू होती है, जिसने महज नौ साल की उम्र में ध्यान करना शुरू कर दिया था, जबकि वह उस समय ध्यान की औपचारिक परिभाषा तक नहीं जानता था। आगे चलकर यही बच्चा घर-परिवार की सहज जिंदगी छोड़कर हिमालय की ओर निकल पड़ा और वहां उसे एक ऐसे गुरु से मिलने का अनुभव हुआ, जिसे वह अपने बचपन की एक रहस्यमय मुलाकात से जोड़ता है।
यह कहानी है श्री एम की—जिनका जन्म नाम मुमताज अली खान है।
6 नवंबर 1948 को केरल के तिरुवनंतपुरम में एक संपन्न मुस्लिम परिवार में जन्मे श्री एम के अनुसार, आध्यात्मिकता की ओर उनका आकर्षण बचपन से ही था। लगभग नौ वर्ष की उम्र में वे अपने कमरे में लेटकर आंखें बंद करते और भीतर की शांति का अनुभव करते थे।
इसी उम्र के आसपास उन्होंने अपने घर के पीछे एक ऐसे व्यक्ति को देखने की बात कही, जो उन्हें सामान्य लोगों से अलग लगा। वर्षों बाद उन्होंने उस व्यक्ति को अपने गुरु महेश्वरनाथ बाबाजी के रूप में पहचानने का दावा किया।
19 की उम्र में घर छोड़ा
परंपरागत शिक्षा में उनकी विशेष रुचि नहीं थी। आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश धीरे-धीरे इतनी गहरी हुई कि लगभग 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने हिमालय जाने का निर्णय लिया।
श्री एम के अनुसार, उन्होंने कई संतों और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों से मुलाकात की, लेकिन उन्हें ऐसा गुरु नहीं मिला जिसे वे अपना मार्गदर्शक स्वीकार कर सकें। अंततः वे हिमालय पहुंचे।
बद्रीनाथ से आगे स्थित व्यास गुफा के आसपास उनकी मुलाकात महेश्वरनाथ बाबाजी से हुई। श्री एम के अपने विवरण के मुताबिक, यही वह व्यक्ति थे जिन्हें उन्होंने बचपन में अपने घर के पीछे देखा था।
इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।
हिमालय में गुरु के साथ प्रशिक्षण
श्री एम के अनुसार, बाबाजी के साथ उन्होंने उपनिषद, क्रिया योग और ध्यान का अध्ययन किया। उनके जीवन-वृत्तांत में इस हिमालयी अवधि को उनकी आध्यात्मिक यात्रा का निर्णायक चरण माना जाता है।
बाद में उन्हें नाथ परंपरा से जुड़ा नाम मधुकरनाथ मिला। श्री एम ने विभिन्न अवसरों पर बताया है कि ‘M’ उनके नाम Mumtaz, Madhukar Nath और व्यापक अर्थ में Manushya/Manav यानी इंसान से भी जुड़ा है।
गुरु बनने की योजना नहीं थी
हिमालय से लौटने के बाद श्री एम तुरंत किसी बड़े आध्यात्मिक गुरु की भूमिका में नहीं आए। वे सत्संगों में भाग लेते रहे और अपने अनुभव साझा करते रहे।
समय के साथ लोगों ने उनसे हिमालय और उनके आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में सुनने की इच्छा जताई। आगे चलकर यही गतिविधियां Satsang Foundation से जुड़ीं।
संस्था आज शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और मानवीय कार्यों से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम चलाती है।
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आध्यात्मिकता से आगे—शिक्षा के क्षेत्र में काम
श्री एम के जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा से जुड़ा है।
1999 में मदनपल्ले, आंध्र प्रदेश के आसपास उन्होंने कुछ बच्चों को मवेशी चराते देखा। संस्था के अनुसार, ये बच्चे लाम्बानी समुदाय से थे और उनके लिए नियमित शिक्षा की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
इसके बाद Satsang Vidyalaya की शुरुआत हुई। संस्था के अनुसार, यह स्कूल पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों को शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। आज वहां सैकड़ों बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
7,500 किलोमीटर की ‘Walk of Hope’
श्री एम की सार्वजनिक यात्रा का सबसे उल्लेखनीय अध्याय है Walk of Hope।
12 जनवरी 2015 को कन्याकुमारी से शुरू हुई यह पदयात्रा 29 अप्रैल 2016 को श्रीनगर में समाप्त हुई। Satsang Foundation के अनुसार, यात्रा ने लगभग 7,500 किलोमीटर की दूरी तय की और 11 राज्यों से होकर गुजरी।
इसका उद्देश्य शांति, सामाजिक एकता और अंतरधार्मिक सद्भाव का संदेश देना था। यात्रा के दौरान विभिन्न धार्मिक स्थलों पर जाना, स्थानीय लोगों से संवाद करना और सामुदायिक प्रार्थनाओं में भाग लेना इसके प्रमुख हिस्सों में शामिल था।
पद्म भूषण से सम्मानित
श्री एम को वर्ष 2020 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। भारत सरकार के आधिकारिक पद्म पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका नाम “Mumtaz Ali (Sri M.)” के रूप में आध्यात्मिकता के क्षेत्र में दर्ज है।
उन्होंने “Apprenticed to a Himalayan Master” जैसी पुस्तक के माध्यम से अपनी आध्यात्मिक यात्रा के अनुभवों को भी सामने रखा है।
श्री एम की कहानी का असली संदेश क्या है?
उनकी कहानी को केवल एक गुरु और शिष्य की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा।
एक संपन्न मुस्लिम परिवार में जन्मा बच्चा—जो बचपन में ध्यान की ओर आकर्षित हुआ, किशोरावस्था में आध्यात्मिक खोज में भटका, 19 वर्ष की उम्र में हिमालय पहुंचा, गुरु से प्रशिक्षण लिया और बाद में सामाजिक सेवा तथा शिक्षा से जुड़ा।
यानी मुमताज अली खान से श्री एम तक की यात्रा केवल नाम बदलने की कहानी नहीं, बल्कि लगातार खोज, अनुभव, सेवा और आत्म-अन्वेषण की कहानी है।
और शायद इसी वजह से उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान उनका कोई एक धार्मिक परिचय नहीं, बल्कि मानवता और एकता पर जोर बन गई।













