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पराली जलाई तो 15 महीने तक ‘रेड कैटेगरी’ में रहेगी जमीन, ₹30 हजार तक पर्यावरण मुआवजे का प्रस्ताव

केंद्र के प्रस्तावित नए नियमों में पराली जलाने वाली जमीन की राजस्व रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ का प्रावधान; दो से पांच एकड़ तक ₹10 हजार और पांच एकड़ से अधिक जमीन पर ₹30 हजार मुआवजा प्रस्तावित

पराली जलाने पर 15 महीने ‘रेड कैटेगरी’ में रहेगी जमीन? केंद्र के नए प्रस्ताव में ₹30 हजार तक जुर्माना

केंद्र सरकार ने पराली जलाने पर सख्ती के लिए नए नियमों का मसौदा प्रस्तावित किया है। पराली जलाने वाली जमीन को 15 महीने ‘रेड कैटेगरी’ में रखने और ₹30 हजार तक पर्यावरण मुआवजे का प्रावधान प्रस्तावित है।

पराली जलाने पर अब जमीन की ‘रेड एंट्री’ ? 15 महीने तक निगरानी में रह सकता है खेत

नई दिल्ली, 18 सितंबर 2026।
दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण की समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने फसल अवशेष यानी पराली जलाने की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए नए नियमों का मसौदा प्रस्तावित किया है। प्रस्तावित व्यवस्था में यदि किसी कृषि भूमि पर पराली जलाने की घटना सामने आती है और संबंधित किसान को इसके लिए जिम्मेदार पाया जाता है, तो उस जमीन को 15 महीने तक ‘रेड कैटेगरी’ में रखने का प्रावधान किया गया है।

प्रस्तावित नियम पर्यावरण मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए हैं और इनमें मौजूदा 2023 के नियमों तथा 2024 में किए गए संशोधनों को बदलने की बात है। सरकार ने मसौदे पर हितधारकों से 60 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। इसलिए फिलहाल ये प्रावधान अंतिम नियम नहीं हैं।

क्या है ‘रेड कैटेगरी’ का प्रस्ताव ?

मसौदे के अनुसार, जिस कृषि भूमि से पराली जलाने की घटना जुड़ी पाई जाएगी, उसके भूमि रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ दर्ज की जा सकती है और जमीन को 15 महीने तक ‘रेड कैटेगरी’ में रखा जा सकता है।

हालांकि, मसौदे में इस वर्गीकरण के सभी कानूनी और व्यावहारिक परिणाम स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किए गए हैं। कुछ रिपोर्टों में यह संभावना जताई गई है कि ऐसी जमीन को कुछ सरकारी योजनाओं के लाभ से संबंधित दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन इसे अंतिम नियम का निश्चित प्रावधान नहीं माना जाना चाहिए।

जमीन के आकार के हिसाब से पर्यावरण मुआवजा

प्रस्तावित नियमों में पराली जलाने के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले किसान पर जमीन के आकार के आधार पर पर्यावरण मुआवजा लगाने का प्रावधान है:

कृषि भूमि प्रस्तावित पर्यावरण मुआवजा
2 एकड़ से कम ₹5,000
2 से 5 एकड़ ₹10,000
5 एकड़ से अधिक ₹30,000

ये दरें 2024 में किए गए संशोधन में निर्धारित दरों के अनुरूप हैं। 2024 के आधिकारिक नियमों में भी दो एकड़ से कम के लिए ₹5,000, दो से पांच एकड़ के लिए ₹10,000 और पांच एकड़ से अधिक के लिए ₹30,000 की दर निर्धारित की गई थी।

30 दिन में मुआवजा नहीं दिया तो?

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि निर्धारित पर्यावरण मुआवजे का भुगतान समय पर नहीं किया जाता, तो उसकी वसूली भूमि राजस्व के बकाये के तौर पर किए जाने का प्रावधान है। रिपोर्टों के मुताबिक, भुगतान के लिए 30 दिन की अवधि का प्रावधान प्रस्तावित है।

बार-बार पराली जलाई तो अवधि बढ़ सकती है

मसौदे में दोहराई जाने वाली घटनाओं को लेकर भी सख्ती प्रस्तावित है। यदि उसी भूमि से दोबारा पराली जलाने की घटना जुड़ती है या निर्धारित पर्यावरण मुआवजा जमा नहीं किया जाता, तो ‘रेड कैटेगरी’ की अवधि को अगले 15 महीने तक बढ़ाने का प्रावधान हो सकता है।

वसूले गए पैसे का इस्तेमाल कहां होगा ?

प्रस्तावित व्यवस्था में पर्यावरण मुआवजे से प्राप्त राशि को संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या प्रदूषण नियंत्रण समिति के माध्यम से फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़े कार्यों में इस्तेमाल करने की बात है।

इसमें मुख्य रूप से—

  • फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी
  • फसल विविधीकरण
  • बायोमास के भंडारण और उपयोग की व्यवस्था
  • अनुसंधान एवं विकास
  • किसानों को जागरूक करने के कार्यक्रम

जैसे कार्य शामिल हो सकते हैं।

सरकार का व्यापक फोकस सिर्फ जुर्माने पर नहीं

केंद्र सरकार पहले से ही पराली प्रबंधन के लिए मशीनरी और वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देने की योजनाएं चला रही है। सरकार के अनुसार 2018-19 से 2025-26 के बीच फसल अवशेष प्रबंधन पहलों के लिए ₹4,233.84 करोड़ उपलब्ध कराए गए और 3.53 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें वितरित की गईं। सरकार ने यह भी बताया है कि 2021 की तुलना में 2025 में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में 93 प्रतिशत और हरियाणा में 91 प्रतिशत कमी दर्ज हुई।

अभी अंतिम फैसला नहीं

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 15 महीने की ‘रेड कैटेगरी’ व्यवस्था फिलहाल प्रस्तावित नियम का हिस्सा है। सरकार द्वारा मांगी गई आपत्तियों और सुझावों के बाद मसौदे में बदलाव हो सकता है। अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि नियम किस रूप में लागू होंगे और ‘रेड एंट्री’ का जमीन के प्रशासनिक या सरकारी योजनाओं पर वास्तविक प्रभाव क्या होगा।