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UN Reform पर जयशंकर का दो टूक संदेश: बिना लिखित मसौदे के बातचीत सिर्फ समय गंवाना, बोले- सुधार का विरोध करने वाले UN का इस्तेमाल कर रहे हैं

UN Reform पर जयशंकर का दो टूक संदेश: 

UN Reform पर जयशंकर का दो टूक संदेश: 

UN Security Council Reform: जयशंकर ने कहा- बिना टेक्स्ट के बातचीत सिर्फ समय गंवाना, जानिए भारत की मांग

न्यूयॉर्क, 25 सितंबर 2026: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की लंबे समय से चल रही बहस के बीच भारत ने एक बार फिर प्रक्रिया में ठोस प्रगति की मांग उठाई है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि अगर संयुक्त राष्ट्र सुधार को लेकर सदस्य देश वास्तव में गंभीर हैं, तो बातचीत को केवल सामान्य चर्चाओं तक सीमित रखने के बजाय लिखित मसौदे यानी टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उनके मुताबिक, बिना किसी लिखित टेक्स्ट के बातचीत को वास्तविक वार्ता नहीं कहा जा सकता और ऐसी प्रक्रिया केवल समय हासिल करने का माध्यम बन सकती है।

जयशंकर ने यह टिप्पणी संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान न्यूयॉर्क में आयोजित एक मंत्रीस्तरीय कार्यक्रम में की। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार का मुद्दा हर साल महासभा की बैठकों के दौरान सामने आता है, लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इसे लेकर निराशा और सुधार की मांग दोनों पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। उनके अनुसार, दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक वास्तविकताएं बदल चुकी हैं और संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत संरचना को भी बदलती परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।

‘UN को बदलना UN विरोधी होना नहीं’

विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग को संस्था के विरोध के रूप में देखने से इनकार किया। उनका तर्क था कि जो देश संयुक्त राष्ट्र को प्रासंगिक और प्रभावी देखना चाहते हैं, वे उसकी संरचना में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हैं। जयशंकर ने यह भी कहा कि सुधार का विरोध करने वाले देशों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह भावना मजबूत हो रही है कि वे संयुक्त राष्ट्र का उपयोग तो करते हैं, लेकिन उसके संस्थागत सुधार के प्रति पर्याप्त प्रतिबद्धता नहीं दिखाते। यह जयशंकर का राजनीतिक और कूटनीतिक आकलन है, जिसे उन्होंने अपने संबोधन में व्यक्त किया।

उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया लंबे समय से गतिरोध का सामना कर रही है। भारत सहित G4 समूह—भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान—सुरक्षा परिषद के स्थायी और गैर-स्थायी दोनों वर्गों में विस्तार की मांग कर रहे हैं। 24 सितंबर को G4 देशों के विदेश मंत्रियों ने भी परिषद में जल्द सुधार की जरूरत दोहराई थी। समूह ने कहा था कि मौजूदा सुरक्षा परिषद की संरचना आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती।

भारत की मांग क्या है ?

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार और स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। वर्तमान सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य हैं—5 स्थायी और 10 गैर-स्थायी। स्थायी सदस्यों में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं। भारत का तर्क है कि 1945 में बनी वर्तमान संरचना आज की दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती।

भारत की मांग केवल अपने लिए स्थायी सीट तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली सुरक्षा परिषद में अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका एवं कैरेबियाई क्षेत्र जैसे कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाने की भी वकालत करती रही है। G4 ने भी स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार को सुधार का केंद्रीय हिस्सा बताया है।

टेक्स्ट-बेस्ड बातचीत पर जोर क्यों ?

जयशंकर की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संयुक्त राष्ट्र सुधार वार्ता की प्रक्रिया से जुड़ा है। उनका कहना है कि सदस्य देशों की अलग-अलग राय को एक लिखित मसौदे में दर्ज किया जाना चाहिए और फिर उन प्रस्तावों पर ठोस तरीके से बातचीत होनी चाहिए। उनका तर्क है कि जब तक कोई टेक्स्ट सामने नहीं आता, तब तक यह स्पष्ट नहीं हो सकता कि किन मुद्दों पर सहमति है, किन पर मतभेद हैं और संभावित समझौते की दिशा क्या हो सकती है।

G4 देशों ने भी 24 सितंबर को इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशंस यानी IGN प्रक्रिया में ठोस प्रगति की कमी पर चिंता जताई थी। G4 ने टेक्स्ट-बेस्ड बातचीत को प्राथमिकता देने की बात कही और कहा कि सुधार प्रक्रिया में व्यापक सदस्यता की राय को शामिल किया जाना चाहिए।

बहुमत बनाम सर्वसम्मति का सवाल

जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुधार के संदर्भ में निर्णय प्रक्रिया पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन अंततः किसी प्रस्ताव पर निर्णय के लिए मतदान जैसी प्रक्रिया की आवश्यकता हो सकती है। उन्होंने संकेत दिया कि सुरक्षा परिषद सुधार को केवल सर्वसम्मति की प्रतीक्षा में अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जाना चाहिए।

हालांकि, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वास्तविक सुधार एक जटिल संस्थागत प्रक्रिया है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन और सदस्य देशों के बीच व्यापक समर्थन की आवश्यकता होती है। इसलिए किसी एक देश या समूह की मांग अपने आप में परिषद की संरचना बदलने के लिए पर्याप्त नहीं होती।

UN महासचिव ने भी सुधार की जरूरत बताई

यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी महासभा की आम बहस के दौरान सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने ऐसी सुरक्षा परिषद की जरूरत बताई जो आज की दुनिया को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करे और मौजूदा भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी वैधता बनाए रख सके।

भारत के लिए आगे क्या ?

भारत 2028-29 कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सीट का उम्मीदवार भी है, जिसके लिए चुनाव जून 2027 में होने हैं। हालांकि गैर-स्थायी सीट और स्थायी सदस्यता दो अलग-अलग मुद्दे हैं, लेकिन भारत दोनों स्तरों पर संयुक्त राष्ट्र में अपनी भूमिका और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुधार की बहस सामान्य राजनीतिक वक्तव्यों से आगे बढ़कर किसी ठोस लिखित प्रस्ताव और औपचारिक वार्ता तक पहुंच पाएगी। जयशंकर का संदेश स्पष्ट है कि भारत अब केवल सुधार की आवश्यकता पर चर्चा नहीं, बल्कि प्रक्रिया में ठोस और दस्तावेज-आधारित प्रगति चाहता है।