ग्लेशियर ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालय की संवेदनशीलता उजागर की; यारलुंग त्सांगपो पर चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर भारत में जल-सुरक्षा, बाढ़ और रियल-टाइम डेटा साझा करने की चिंता तेज
हिंदी विंडो | विशेष रिपोर्ट
नेपाल-चीन सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ ने एक बार फिर पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता और सीमा-पार जल सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के ढहने के बाद भारी मात्रा में चट्टान, बर्फ और मलबा नदी तंत्र में जा गिरा। इसके बाद तेज बहाव वाली बाढ़ ने नेपाल और तिब्बत के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। Reuters के अनुसार शुरुआती जांच में आपदा का संबंध ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुए रॉक-एंड-आइस अवलांच तथा मलबे के तेज बहाव से बताया गया है।
29 अगस्त तक राहत और बचाव अभियान जारी है। चीन के अधिकारियों के अनुसार आपदा क्षेत्र के पास ग्लेशियर ढहने के बाद बनी एक झील के फटने का खतरा फिलहाल कम हुआ है और उसका जल धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से निकल रहा है। हालांकि दूसरी जलराशि पर निगरानी जारी है, इसलिए क्षेत्र में जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा।
इस प्राकृतिक आपदा ने भारत में एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण चिंता को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है—तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना।
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नाम से बहने वाली यही नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। चीन ने 2025 में इसके निचले हिस्से में दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक का निर्माण शुरू किया था। Reuters के अनुसार परियोजना में पांच कैस्केड जलविद्युत स्टेशन प्रस्तावित हैं और इसकी अनुमानित वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 300 अरब किलोवाट-घंटे बताई गई है।
भारत की चिंता केवल बांध की क्षमता को लेकर नहीं है। सवाल यह भी है कि इतने बड़े जलविद्युत ढांचे का हिमालय जैसे भूकंपीय और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण भविष्य में नदी के प्रवाह, तलछट, पारिस्थितिकी और आपदा प्रबंधन को किस तरह प्रभावित कर सकता है।
भारत पहले ही चीन के सामने इस परियोजना को लेकर अपनी चिंताएं उठा चुका है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने जनवरी 2025 में कहा था कि भारत ने चीन के सामने यारलुंग त्सांगपो पर बांध परियोजना से जुड़ी चिंताओं को रखा है।
एक और अहम मुद्दा है—सीमा-पार हाइड्रोलॉजिकल डेटा। भारत और चीन के बीच बाढ़ के मौसम में नदी संबंधी जल-विज्ञान संबंधी आंकड़ों और आपदा प्रबंधन को लेकर Expert Level Mechanism मौजूद है। भारत सरकार के अनुसार अप्रैल 2025 में इस तंत्र की 16वीं बैठक नई दिल्ली में हुई थी।
हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि नेपाल में आई मौजूदा बाढ़ चीन के मेडोग डैम की वजह से आई है। मौजूदा आपदा और मेडोग परियोजना के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित नहीं हुआ है।
असल चिंता भविष्य की है।
यदि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने, झील फटने, भूस्खलन या किसी बड़े जल ढांचे से जुड़ी आपात स्थिति पैदा होती है, तो भारत जैसे डाउनस्ट्रीम देश के लिए समय पर, सटीक और रियल-टाइम सूचना बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
यही वजह है कि नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने चीन की विशाल जल परियोजना के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्र में अर्ली वार्निंग सिस्टम, सीमा-पार डेटा साझेदारी और आपदा समन्वय की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है।
‘हिंदी विंडो’ का निष्कर्ष:
नेपाल की मौजूदा बाढ़ को चीन के मेडोग बांध से जोड़ना तथ्यों से परे होगा। लेकिन इस आपदा ने यह जरूर दिखा दिया है कि हिमालय में प्राकृतिक आपदा, ग्लेशियर, भूस्खलन और बड़े जल-ढांचे—इन सभी को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय जल-सुरक्षा और आपदा-प्रबंधन ढांचे के तहत देखना होगा।
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