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पश्चिमी हिमालय पर जलवायु संकट की दस्तक: सदी के अंत तक 7°C से ज्यादा बढ़ सकती है सर्दियों की गर्मी, बर्फ पिघलने की रफ्तार तीन गुना होने का खतरा

नई दिल्ली/देहरादून | 19 अगस्त 2026

हिमालय की बर्फीली चोटियों पर जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ वैज्ञानिक चेतावनी नहीं रह गया है। नए शोध ने संकेत दिया है कि पश्चिमी हिमालय में तापमान वृद्धि की रफ्तार आने वाले दशकों में बेहद तेज हो सकती है, जिसका सीधा असर बर्फ, ग्लेशियर, जलस्रोत और हिमालयी पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है।

Journal of Earth System Science में प्रकाशित अध्ययन “Vulnerability of the Himalayan region under the climate change” में वैज्ञानिकों ने हिमालय के पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिस्सों में लंबे समय के तापमान रुझानों और भविष्य के जलवायु अनुमानों का विश्लेषण किया है। अध्ययन में 1901 से 2020 तक के CRU तापमान आंकड़ों तथा CMIP6 जलवायु मॉडल अनुमानों को शामिल किया गया।

पश्चिमी हिमालय सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में

अध्ययन में हिमालय को तीन प्रमुख हिस्सों में देखा गया है—पश्चिमी हिमालय में लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश, मध्य हिमालय में उत्तराखंड, जबकि पूर्वी हिमालय में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर क्षेत्र शामिल हैं।

शोध के अनुसार पिछले लंबे समय के तापमान रिकॉर्ड में हिमालय के सभी हिस्सों में गर्मी बढ़ने के संकेत मिले हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार शुरुआती 20वीं सदी की तुलना में हाल के दशकों में सर्दियों और बसंत के तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। पश्चिमी हिमालय में सर्दियों के तापमान में लगभग 1.06°C और बसंत में करीब 1.08°C वृद्धि बताई गई है।

रात का तापमान भी बड़ी चिंता

अध्ययन से जुड़ी रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आता है कि पश्चिमी हिमालय में रात का तापमान दिन की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। यह बदलाव हिमालयी बर्फ और ग्लेशियरों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक अपेक्षाकृत ठंडी रातें न रहने से बर्फ के जमने और टिके रहने की परिस्थितियां बदल सकती हैं।

सदी के अंत तक कितना बदल सकता है तापमान?

उच्च उत्सर्जन जारी रहने वाले परिदृश्य में 2081–2100 की सर्दियों के दौरान पश्चिमी हिमालय का तापमान 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों की तुलना में लगभग 7.18°C अधिक हो सकता है। इसी अवधि में मध्य हिमालय के लिए करीब 6.71°C और पूर्वी हिमालय के लिए करीब 5.82°C अधिक तापमान का अनुमान रिपोर्ट किया गया है।

यह आंकड़े किसी एक वर्ष के मौसम का पूर्वानुमान नहीं हैं, बल्कि जलवायु मॉडल पर आधारित दीर्घकालिक संभावनाएं हैं। इसलिए इन्हें भविष्य की जलवायु दिशा के संकेत के तौर पर समझना चाहिए।

बर्फ पिघलने की रफ्तार तीन गुना होने का खतरा

अध्ययन की सबसे गंभीर चिंताओं में से एक है बसंत के मौसम में बर्फ पिघलने की गति में संभावित तेज वृद्धि। रिपोर्ट के मुताबिक यदि प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया, तो इस सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में बसंत के दौरान बर्फ पिघलने की दर वर्तमान से कई गुना बढ़ सकती है—रिपोर्ट में इसे लगभग तीन गुना तक पहुंचने की संभावना के रूप में बताया गया है।

हालांकि वैज्ञानिक साहित्य यह भी बताता है कि हिमालय के अलग-अलग हिस्सों में बर्फ और ग्लेशियरों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। हालिया अध्ययनों में क्षेत्रीय स्तर पर बर्फ के व्यवहार में अंतर भी सामने आया है। इसलिए पूरे हिमालय के लिए एक ही तरह का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

इसका असर उत्तराखंड और हिमालयी नदियों पर क्यों महत्वपूर्ण है?

हिमालय सिर्फ बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखला नहीं है। यह एशिया के बड़े हिस्से के लिए जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली प्रमुख नदी प्रणालियां—सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र—बर्फ, ग्लेशियर, वर्षा और मौसमी जल प्रवाह से प्रभावित होती हैं।

तेजी से बर्फ पिघलने का मतलब हमेशा तुरंत पानी की कमी नहीं होता। कुछ परिस्थितियों में शुरुआती दौर में नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में बर्फ और ग्लेशियरों के भंडार में कमी होने पर जल उपलब्धता की मौसमी स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

इसके साथ ही बदलते तापमान और बर्फ पिघलने से हिमालयी ढलानों, ग्लेशियर झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ जैसे खतरों पर भी असर पड़ सकता है। वैज्ञानिक साहित्य हिमालय-कराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के जोखिम को लेकर भी चिंता जताता है।

सिर्फ ग्लेशियर नहीं, पूरा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित

बर्फ का जल्दी पिघलना वनस्पतियों, वन्यजीवों, कृषि, चरागाहों और पर्वतीय समुदायों के जीवनचक्र को भी बदल सकता है। हालिया शोध में हिंदूकुश-कराकोरम-हिमालय क्षेत्र में मौसमी बर्फ के पहले पिघलने के संकेत मिले हैं और इससे बर्फ-मुक्त अवधि बढ़ने तथा वनस्पति गतिविधियों में बदलाव की संभावना बताई गई है।

हिमालय के लिए संदेश साफ है

नए शोध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि हिमालय को एक समान जलवायु क्षेत्र मानकर नहीं चलाया जा सकता। पश्चिम, मध्य और पूर्वी हिमालय में तापमान, बर्फबारी और वर्षा के पैटर्न अलग हैं और भविष्य में इनके बदलाव भी अलग-अलग हो सकते हैं।

इसलिए हिमालयी राज्यों के लिए केवल आपदा आने के बाद राहत व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। तापमान, बर्फ, ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलों, वर्षा और नदी प्रवाह की लगातार निगरानी, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और जलवायु-अनुकूल विकास नीति अब पहले से अधिक जरूरी हो गई है।